मानवता के महान उपासक गुरु नानक देव
Sadhana Path|November 2021
सिरवों के प्रथम गुरु नानक देव जी का रुझान बचपन से ही अध्यात्म की तरफ था। नानक जी ने समाज में व्याप्त कुरीतियों और रूढ़ियों को तोड़ा आइए नानक देव जी की आध्यात्मिक यात्रा को इस लेख से जानें।
देवप्रिया सिंह

इस धरती पर मनुष्य में जब भी सात्विक गुणों का विकास करना होता है तब मनुष्य को सन्मार्ग की दिशा तय करने के लिए कोई न कोई सिद्ध पुरुष इस धरती पर अवतरित होता है इन्हीं महापुरुषों में एक सिद्ध पुरुष गुरुनानक देव आते हैं।

गुरुनानक देव का जन्म संवत 1526 कार्तिकी पूर्णिमा के दिन तलवंडी नामक स्थान लाहौर में हुआ था अब तो वह स्थान ननकाना साहब के नाम से प्रसिद्ध है। इनके पिता का नाम कालचन्द था। ये लाहौर तहसील शरकपुर के तलवंडी नगर के सूबा बुलार पठान के कारिन्दा थे। इनकी माता का नाम तृप्ता था। गुरुनानक देव आरम्भ से ही ईश्वर भक्ति में लीन रहते थे इनके पिता चाहते थे कि ये व्यापार संभालें। एक बार इनके पिता ने कहा पुत्र बाला के साथ लाहौर जाओ और कोई सच्चा सौदा करो। रास्ते में इन्हें एक साधु तपस्यारत दिखायी पड़े नानक को चिंता हुई इन्हें खाने-पीने की व्यवस्था कौन करता होगा? नानक ने सोचा इससे अच्छा सौदा क्या होगा?

नानक ने पास के गांव से खाने-पीने की सामग्री मंगायी और उन साधुओं को भरपेट भोजन कराया फिर घर लौट आये इनके पिता बहुत नाराज हुए। इन्होंने कहा पिता जी कर्म करते हुए अपना मन वाहे गुरु में लगाना भले लोगों की संगति करना और मिल बांट कर खाना यही तो सच्चा सौदा है। ये एकान्त में बैठकर घंटों तक चुपचाप मनन और चिंतन किया करते थे, ये ईश्वर के भजन और कीर्तन में इतने लीन रहते थे कि इन्हें खाने-पीने की सुध भी न रहती। एक बार इनके पिता ने सोचा कि इन्हें कोई असाध्य रोग हो गया है। वैद्य ने नानक की नाड़ी देखी लेकिन उन्हें उनके किसी रोग का पता नहीं चला, नानक ने अपने पिता से कहा-

'वैद्य बुलाया वैदगी, पकड़ी टटोले बांहि। भोला वैद्य न जानगी, करक कलेजे माहि॥

अर्थात् आयुर्वेद का वैद्य केवल बांह या नाड़ी टटोल कर मेरे रोग का पता नहीं लगा, क्योंकि पीड़ा तो मेरे मन में है। यही नानक आगे चलकर सिक्खों के प्रथम गुरु नानक देव के नाम से प्रसिद्ध हुए। मरदाना रबानी इनका प्रमुख शिष्य था। कहते हैं-

एक बार संत नानक एक गांव में गये वहां के निवासियों ने उनका बड़ा आदर किया चलते समय नानक जी ने आशीर्वाद दिया 'उजड़ जाओ' वे दूसरे गांव में गये तो वहां के लोगों ने तिरस्कार किया कटुवचन बोले। नानक जी ने आशीर्वाद दिया 'आबाद रहो। साथ में चल रहे शिष्यों ने पूछा भगवान आपने आदर करने वालों को उजड़ जाओ और तिरस्कार करने वालों को आबाद रहो का उल्टा आशीर्वाद क्यों दिया?

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