हिंदुत्व की पहचान संस्कार
Sadhana Path|July 2021
संस्कार से ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है। हमारे वेद पुराणों में भी कई संस्कारों का वर्णन है और यह सभी संस्कार वैज्ञानिक आधारों पर निर्मित हैं। कौन-कौन से हैं संस्कार तथा क्या है इन संस्कारों का महत्त्व? आइए जानते हैं।
मीना भण्डारी

हम सदियों से अपने रीति-रिवाजों को मानते चले आ रहे हैं जिनमें संस्कारों की भी अहम भूमिका है। पुंसवन, जातकर्म, नामकरण, उपनयन से लेकर पाणिग्रहण तक के संस्कार हम करते हैं। यह सारे संस्कार हम सिर्फ इसलिए पूरे करते हैं क्योंकि हमारे पूर्वजों ने भी ऐसा ही किया था। संस्कारों से हमारा जीवन बहुत प्रभावित होता है। संस्कार के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों में जो पूजा, यज्ञ, मंत्रोच्चाण आदि होता है, उसका वैज्ञानिक महत्त्व साबित किया जा चुका है। लेकिन क्या कभी हमने यह सोचने की कोशिश की है कि इन संस्कारों के पीछे वजह क्या है, इनका प्रभाव और लाभ क्या है? और किस तरह ये विज्ञान की कसौटी पर भी खरे उतरते हैंआइए जानते हैं।

संस्कार क्या हैं?

संस्करण या संशोधन का नाम संस्कार है। शरीर पर की जाने वाली क्रियाओं से जो विशिष्टता आ जाती है वही संस्कार हैं। पूर्व विद्यमान पदार्थों के दोषों को हटाकर गुणों को समाहित करने के लिए संस्कार आवश्यक है। संस्कार विहीन व धर्माश्रय विहीन व्यक्ति को पशुवत माना गया है। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि संस्कारों को पूर्ण करने पर ही मानव द्विज कहलाता है। 'संस्कारात द्विज उच्यते' द्विज शब्द का तात्पर्य दूसरा जन्म माना जाता है तथा संस्कारों से संस्कारित करना भी पुनर्जन्म कहलाता है। ये संस्कार गर्भाधान के पूर्व से लेकर मृत्यु पर्यंत तक के हैं। उनमें कई संस्कार दोषों को हटाने वाले हैं, तो कई संस्कार गुण डालने वाले हैं। 'गौतम धर्मसूत्र' में इनकी संख्या 48 है, लेकिन 'महाभारत' के अनुसार मुख्य संस्कारों की संख्या सोलह है।

जन्म से मृत्यु तक सोलह संस्कार ही वैदिक विधान में महत्त्वपूर्ण माने गए हैं इन सभी संस्कारों के वैज्ञानिक (चिकित्सकीय व भौतिक) तथा आध्यात्मिक आधार हैं। संपूर्ण जीवन संस्कारों पर आधारित है। मृत्यु से पूर्व, मृत्यु के उपरान्त, जन्म से पूर्व व जन्म के उपरान्त धर्मानुसार सभी प्रकार की उन्नति संस्कारों के द्वारा ही संभव है। जीवन भी एक अनुष्ठान है, एक यज्ञ है जिसमें आदि और अन्त तक संस्कारों की प्रधानता है। संस्कारों के बिना जीवन पशु जीवन के समान है।

गर्भाधान संस्कार- संस्कारों में पहला संस्कार गर्भाधान का है संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाली स्त्रियों का गर्भाधान संस्कार किया जाता है। यह ऐसा संस्कार है, जिससे हमें योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान के लिए गर्भ धारण किस प्रकार करें, इसका विवरण दिया गया है। इस संस्कार से कामुकता का स्थान अच्छे विचार ले लेते हैं।

माता-पिता के संयोग से जो सन्तानोपत्ति होती है, उसमें माता के रज में योषाप्राण एवं पिता के शुक्र में वृषाप्राण रहता है। इसमें कितने ही आगन्तुक दोषों के कारण ये प्राण दूषित हो जाते हैं। अन्य कारणों के अतिरिक्त ग्रह दोष, पितृ दोष, नाड़ी दोष, व्याधि दोष, अतिवायव्य दोष इत्यादि के प्रभावों से भी ये प्राण दूषित हो जाते हैं। गर्भस्थापन के समय इन सभी दोषों से मुक्ति के लिए यह संस्कार किया जाता है। मंत्र शक्ति के माध्यम से इन दोषों का बालक के मन पर प्रभाव न पड़े इसलिए यह संस्कार किया जाता है।

पुंसवन संस्कार- गर्भधारण का निश्चय हो जाने पर गर्भस्थ शिशु को पुंसवन नामक संस्कार से अभिषिक्ति किया जाता है। यह संस्कार गर्भस्थापन के तीन माह के अन्दर करने का विधान है। इस संस्कार के माध्यम से वृषाप्राण को बल प्रदान किया जाता है, जिससे पहली संतति पुरुष ही होती है। क्योंकि गर्भाधान काल से लेकर तीन माह तक शिशु लिंग का निर्धारण होता है। इस संस्कार का तात्पर्य केवल पुत्र करना ही नहीं बल्कि गर्भस्थ संन्तान को बल, बुद्धि व स्वस्थ्य मस्तिष्क व उत्तम संस्कारों से युक्त बनाना भी है। इसमें माता-पिता दोनों ही गर्भस्थ बालक के शारीरिक व मानसिक विकास में प्रयत्नशील रहने का व्रत लेते हैं।

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