अयोध्या-अपराजेय आस्था की नगरी
Sadhana Path|April 2021
श्री राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विध्वंस कांड इस सदी की प्रमुस्वतम महत्त्वपूर्ण धार्मिक-राजनैतिक घटना मानी जाती है लेकिन सच तो यह है कि अयोध्या, जिसका अर्थ ही है 'वह स्थल जिसके विरुद्ध कभी युद्ध न किया जा सके', उसका हृदय स्थल सदियों से ध्वंस एवं निर्माण का इतिहास रचते रहे हैं।
सुशील सक्सेना

कल कल बहती सरयू के जल में अटखेलियां करती नावों की लम्बी सी पंक्ति, किनारे दूर-दूर तक फैले घाटों की सीढ़ियों पर पूजाअर्चना के उपक्रम में लगे साधु एवं गृहस्थ और सरयू किनारे बने ढेर सारे प्राचीन मंदिरों से उठकर नदी की लहरों से टकराती घंटो-घंटियों की मधुर ध्वनि, सचमुच अयोध्या का नैसर्गिक सौन्दर्य 1992 के बाबरी मस्जिद काण्ड के बाद भी फीका नहीं पड़ा है।

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में बसी, अवध प्रदेश की इस प्राचीन राजधानी, मुस्लिम काल में अवध प्रान्त के गवर्नर की सीट रह चुकी अयोध्या को गौतम बुद्ध के काल में तत्कालीन पाली भाषा में अयोझा कहा जाता था।

इतिहास की बात करें तो 127 ईसवीं में कुणाल वंश के सफल शासक कनिष्क ने साकेत नाम से प्रसिद्ध इस अयोध्या नगरी पर विजय प्राप्त की और इसे अपनी पूर्वी राजसत्ता का प्रशासनिक केन्द्र बनाया था लेकिन पौराणिक दृष्टि से राजा मनु द्वारा निर्मित राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित यह नगरी सूर्यवंशीय राजाओं द्वारा शासित विश्व की प्राचीनतम हिन्दू नगरियों में से एक थी। इसे मोक्षदायिनी नगरी का सम्मान प्राप्त था। इस नगरी का क्षेत्रफल 250 कि.मी. तक फैला हआ था। राजा दशरथ सूर्यवंशीय पीढ़ी के 63वें शासक थे, जिनके घर श्रीराम का जन्म हुआ, जिन्हें विष्णु का 7 वां अवतार माना गया।

जैन धर्म के प्रवर्तक ऋषभदेव सहित यह 5 तीर्थकरों की जन्मभूमि भी मानी जाती है। मौर्य एवं गुप्त साम्राज्य-काल में यहां कई बौद्ध मंदिरों के होने के प्रमाण भी मिलते हैं। स्वामीनारायण सम्प्रदाय के संस्थापक स्वामीनारायण जी का बचपन भी इसी नगरी में बीता और उन्होने नीलकंठ के रूप में अपनी 7 वर्षीय यात्रा यहीं से प्रारम्भ की। 600 ईसा पूर्व यह नगरी व्यापार का प्रमुख केन्द्र थी। यह स्थल बौद्ध धर्म का केन्द्र भी रहा और यहां गौतम बुद्ध का कई बार आगमन हुआ। फाहियान ने यहां बौद्ध धर्म का जिक्र किया है। भारत के प्रथम चक्रवर्ती राजा भरत एवं सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र भी इसी नगरी में जन्में।

तथ्यों के अनुसार अवध के तत्कालीन नवाव ने 10 वीं शताब्दी में यह भूमि दान में दी और उसके ही एक हिन्दू दरबारी ने इस मन्दिर का निर्माण करवाया। बाद में अंग्रेजी शासन काल में नवाव मंसूर अली ने अपने दरबारी टिकैत राय के द्वारा इसे गढ़ी (किले जैसा) रूप दिया। जन मान्यता है कि जन्मभूमि अथवा रामकोट की रक्षार्थ पवनपुत्र हनुमान यहां सूक्ष्म रूप में निवास करते हैं।

इसमें रामघाट महत्त्वपूर्ण है। रामनवमी अर्थात् श्री राम अवतरण दिवस पर यहां स्नान अत्यन्त पुण्य दायक माना जाता है। सभी नर, नाग, यक्ष, गन्धर्व एवं देव सूक्ष्म रूप में इस अवसर पर यहां स्नान कर श्री राम के भव्य स्वरूप का दर्शन पाते हैं, ऐसा विश्वास जन-जन में व्याप्त है। गुरू वशिष्ट ने भी इस पर्व के स्नान को मोक्षदायी स्नान बताया है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक शुक्ल नवमी को लगने वाली चौदह कोसी परिक्रमा एवं कार्तिक शुल्क एकादशी को लगने वाली पंचकोसी परिक्रमा के बाद यहां स्नान की सदियों पुरानी परम्परा है।

यह स्थल बौद्ध धर्म का केन्द्र भी रहा और यहां गौतम बुद्ध का कई बार आगमन हुआ। भारत के प्रथम चक्रवती राजा भरत एवं सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र भी इसी नगरी में जन्में।

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