श्री राम से जुड़े प्रमुख तीर्थ व मंदिर
Sadhana Path|April 2021
प्रभु राम ने अपने जीवन चरित्र से इस धरा पर रहने वाले मनुष्यों के लिए आदर्शों की स्थापना की। अपने सभी संबंधों में वह आदर्श की कसौटी पर पूर्णतः खरे उतरे। देश के हर कोने में उन्हें पूजा जाता है, न केवल भगवान राम बल्कि उनके जीवन से जुड़े क्षेत्रों को भी तीर्थ के समान ही समझा जाता है। यहां हम आपको राम जी से जुड़े ऐसे ही तीर्थ व मंदिरों से रूबरू करवा रहे हैं।
लक्ष्मी कुमारी

भारतवर्ष एक ऐसा देश है, जिसकी पावन धरती की रजरज में राम बसते हैं। इस आधुनिक कलयुग में राम के मंदिर, राम की भक्ति ही मनुष्य को ईश्वर से जोड़े हुए है। देश के हर कोने में आज राम के मंदिर सुशोभित हैं और व्यक्ति को राममय कर देते हैं। आइए इस विशेषांक में हम देश के प्रमुख श्री राम के मंदिरों की यात्रा करते हैं और अपने जीवन के कुछ पल ईश्वर को भेंट कर देते हैं।

अयोध्या जन्मभूमि मंदिर

अयोध्या श्री राम का जन्म स्थल है। वाल्मीकि रामायण में हमें अयोध्या का वर्णन पढ़ने को मिलता है। सरयू नदी के किनारे यह जन्मस्थान बेहद ही प्राचीन और सुंदर है। श्री राम के समय अयोध्या को कौशल देश के नाम से भी जाना जाता था। अथर्ववेद में अयोध्या का वर्णन देवताओं की भूमि के रूप में किया गया है, जो स्वयं अपने आप में किसी स्वर्ग से कम नहीं।

आज अयोध्या सभी हिन्दुओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण पावन स्थल है। परंतु दुर्भाग्यपूर्ण वहां आज तक श्री राम का जन्मस्थल मंदिर नहीं बन सका है। 1520 ई. में अयोध्या पर बाबर ने कब्जा कर लिया और श्री राम के जन्म स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण किया। श्री राम का आज यहां एक छोटा सा मंदिर है और मस्जिद के स्थान पर भव्य मंदिर बनाना देश में राजनीति का एक मुद्दा बनकर रह गया है। सरयू नदी की अयोध्या में बहुत मान्यता है। कहा जाता है कि सरयू में स्नान करने से व्यक्ति के बड़े से बड़े पाप भी धुल जाते हैं।

अयोध्या में राम भक्त हनुमान की बड़ी सी मूर्ति है जो भक्त जनों के आकर्षण का केंद्र है। गुप्तर घाट एक बेहद ही शांत मंदिर है, जहां माना जाता है कि भगवान राम ने अपने शरीर का त्याग किया था। रामकोट अयोध्या में एक प्रमुख पूजा स्थल है।

रामेश्वरम्

चार धामों में से एक रामेश्वरम् का रामायण में एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। हिन्दुओं के लिए यह एक पवित्र स्थान है। यह भारत से पम्बन पुल से जुड़ा हुआ टापू है। कहा जाता है कि रावण द्वारा सीता का हरण होने के बाद श्री राम यहां उससे युद्ध करने के लिए लंका जाने के लिए आए थे। यहीं पर उन्होंने समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना की थी और आसानी से प्रार्थना न सुनने पर उसे बाण से सुखाने के लिए धनुष भी उठा लिया था। रामेश्वरम् से ही हनुमान ने लंका के लिए उड़ान भरी थी और उसे स्वाहा कर माता सीता का शुभ समाचार लेकर लौटे थे।

कहा जाता है कि यहीं पर श्री राम ने रावण का वध करने के बाद उस पाप से मुक्ति पाने के लिए शिव जी की अराधना की थी। जब हनुमान जी ने हिमालय से शिवलिंग लाने में विलम्ब किया तो देवी सीता ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और दोनों ने उसकी पूजा-अर्चना की। बाद में जब हनुमान जी शिवलिंग लेकर लौटे और रेत से बने शिवलिंग को हटाना चाहा तो वह न हटा सके। आज भी रामेश्वरम् में वह शिवलिंग स्थापित है। रामे के मंदिर में श्री राम ने ग्यारह शिवलिंगों की स्थापना की।

दर्भशयनम् में माना जाता है कि भगवान राम ने कुश घास पर लेटकर समुद्र के मार्ग देने की प्रतीक्षा की थी।

राम तीर्थ मंदिर

राम तीर्थ मंदिर की महत्ता लव और कुश के जन्मस्थल से है। यह मंदिर उसी स्थान पर स्थित है जहां ऋषि वाल्मीकि का आश्रम था और उन्होंने माता सीता को श्री राम द्वारा त्यागे जाने के बाद उन्हें शरण दी थी।

इसी स्थान पर सीता माता ने दो जुड़वां पुत्रों लव और कुश को जन्म दिया। इसी स्थान पर महर्षि वाल्मीकि ने लव और कुश को उच्च शिक्षा-दीक्षा दी और महान योद्धा बनाया।

हिन्दुओं के लिए यह स्थान बेहद ही पवित्र है जहां रामायण के कुछ महत्त्वपूर्ण दृश्यों का चित्रण है।

काला राम मंदिर

काला राम मंदिर नासिक का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है, जिसकी स्थापना 1790 में सरदार ओढेकर ने की थी। यहां पर काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है जिससे यह नाम पड़ा। मंदिर में श्री राम की मूर्ति के साथ माता सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां हैं। मंदिर को बनवाने में 23 लाख का व्यय हुआ था और 2000 मजदूरों ने मिलकर 12 वर्षों में निर्माण कार्य को पूरा किया था।

काला राम मंदिर के प्रांगण में श्री विठ्ठल, गणेश, हनुमान जी के भी मंदिर हैं। मंदिर 70 फुट ऊंचा है और उसके गुम्बद पर सोने का पानी चढ़ा है।

तुलसी मानस मंदिर

तुलसी मानस मंदिर वाराणसी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। इसका निर्माण 1964 में हुआ था। सफेद संगर्ममर से बना यह मंदिर हिन्दुओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। कहा जाता है कि इस मंदिर के प्राचीन स्वरूप की स्थापना उसी समय हुई थी जब गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस का लेखन आरम्भ किया था।

तुलसी मानस मंदिर की दीवारों पर रामायण के चित्र और दोहे अंकित हैं। ऐसी मान्यता है कि लेखन के समय तुलसीदास इसी स्थान पर रहते थे।

भद्राचलम मंदिर

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