सिर्फ एक ही ईश्वर है और उसका नाम है सत्यः नानक
Sadhana Path|November 2020
सिखों के प्रथम गुरु थे नानक । अंधविश्वास एवं आडंबरों के विरोधी गुरुनानक का प्रकाश उत्सव अर्थात् उनका जन्मदिन कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है । गुरु नानक का मानना था कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त है । संपूर्ण विश्व उन्हें सांप्रदायिक एकता, शांति एवं सद्भाव के लिए स्मरण करता है।
जगजीत सिंह अरोड़ा

लगभग साढ़े पांच सौ वर्ष पूर्व भारत कई छोटे छोटे भागों में विभाजित था। हर भाग स्वतंत्र रूप से एक राज्य था। इन राज्यों के राजा एक दूसरे के शत्रु होते थे और एक दूसरे पर हमला करते रहते थे। चारों तरफ अत्याचार और अनैतिकता का वर्चस्व था। सांप्रदायिक झगड़े आए दिन होते रहते थे।

इन विषम परिस्थितियों के बीच 20 अक्टूबर, 1469 को कार्तिक की पूर्णमासी के दिन तलवंडी (अब पाकिस्तान) में एक महापुरुष का जन्म हुआ। उनके पिता का नाम कालू मेहता एवं माता का नाम त्रिपता जी था। दौलता दाई ने बताया कि जन्म के समय बालक रोने के बजाय हंस रहा था और उसके मुंह पर तेज था, बालक ने वाहिगुरु भी बोला था। मुझे लगता है कि यह बालक अलौकिक है। कुछ दिनों बाद नाम रखने के लिए पंडित को बुलाया गए। जिसने नाम रखा नानक। लोगों ने कहा, 'कैसा नाम है? इससे पता ही नहीं चलता कि हिन्दू है अथवा मुसलमान', पंडित ने बताया कि ऐसा बालक आज तक नहीं देखा। अब

तक हिन्दू मुसलमान अपने अपने अवतारों की पूजा करते आए हैं, नानक की पूजा दोनों करेंगे। यह बालक स्वयं अवतार के रूप में संसार का कल्याण करने के लिए आया है।

बहुत छोटी आयु में नानक भक्तों की तरह चौकडी मार ईश्वर भक्ति में लीन हो जाते थे, साथी बालकों के साथ खेलते समय उन्हें भगवान का नाम लेने के लिए कहते थे। उन्हें घर से लाकर रोटी एवं अन्य चीजें देकर कहते थे कि मिलकर खाओ।

सात वर्ष की आयु होने पर उन्हें पंडित जी के पास पढ़ने भेजा गए। पंडित जी ने उन्हें कुछ अक्षर लिखकर दिये । नानक जी ने उन अक्षरों के अर्थ पूछे। पंडित जी ने कहा अक्षर के अर्थ नहीं होते, अक्षर के साथ मिलकर जो शब्द बनेगा उसके अर्थ होंगे। नानक जी ने अक्षर के श्लोक सुना दिये। पंडित ने कहा 'आप को कौन पढ़ा सकता है, आप तो दुनिया को पढ़ाने आए हैं।' फिर पिता जी ने एक मौलवी के पास पढ़ने भेजा। नानक जी ने मौलवी को ही पढ़ा दिया 'अव्वल अल्ला नूर उपाया कुदरत के सब बंदे, एक नूर ते सब जग उपजया कौन भले कौन मंदे।'

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