जीवन से भरी एक स्त्री
Samay Patrika|September 2021
मशहूर साहित्यकार उषाकिरण खान के बारे में
निवेदिता

जो लोग आपके प्रिय हों उनके बारे में लिखना आसान नहीं होता। उषाकिरण खान के बारे में लिखना मेरे लिए समुद्र के गहरे जल में उतरने जैसा है। जानती तो उन्हें वर्षों से थी पर वह जानना एक पत्रकार का एक लेखक को जानने जैसा था। जैसे-जैसे उनके नज़दीक गयी मैंने पाया ज़िन्दगी ढेर सारे रंगों के साथ मौजूद है। हैरान थी एक स्त्री के भीतर इतने सारे रंगों को देखकर। ज़िन्दगी के इस पड़ाव पर बहुत कम लोग इतने सक्रिय रहते हैं। उन्हें देखकर मुझे हमेशा महान अभिनेत्री जोहरा सहगल की याद आती है, जो ज़िन्दगी के 92 साल तक अभिनय करती रहीं, थिरकती रहीं। जीवन से भरी हुई जोहरा सहगल ने इस मुक़ाम को पाने के लिए लम्बा संघर्ष किया। एक स्त्री के लिए रचना एक संघर्ष है। जब स्त्री रचती है तो परम्पराएँ टूटती हैं। स्त्री के लिए लिखना खून से सनी राहों पर चलने जैसा है। ये राह उषाकिरण खान ने चुनी और अपनी धुन में आगे बढ़ती गयीं। इस घुमावदार और रोमांचक सफ़र में आम लोगों की ज़िन्दगी, हमारी परम्परा, हमारे इतिहास को उन्होंने समेटा और अदब की दुनिया में नया मुक़ाम बनाया। उषा दी के लेखन में ज्ञान और संवेदना का अद्भुत सामंजस्य है। अपने लेखन में उन्होंने मानवीय सच को प्रमाण के तौर पर पेश किया। वह एक कठिन डगर पर चल पड़ीं, जहाँ पहले से कोई निशान नहीं था। अपने पैरों पर चलकर उन्होंने जो राह बनायी वह हर स्त्री की राह बन गयी। एक बार मैंने उनसे पूछा था, आप लिखती कब हैं? उन्होंने हँसते हुए कहा, एक औरत को अपनी गृहस्थी के साथ लेखन के लिए समय निकालना आसान नहीं है। मैंने अपने लिए चार बजे भोर का समय चुना। सारे दिन कामकाज के बाद इतनी थकान होती थी कि लिखने के लिए वक़्त नहीं निकाल पाती थी। फिर हमने तय किया कि चार बजे सुबह मेरे लिखने का समय होगा। वह आदत आज तक बनी हुई है। हिन्दी और मैथिली में उन्होंने लगातार लिखा और अभी भी लिख रही हैं। फागुन के बाद,सीमान्त कथा, रतनारे नयन, पानी पर लकीर, त्रिज्या और भामती जैसे उपन्यास ने पाठकों के मन की भीतरी परत को कुरेदा है। उषा दी इतिहास की छात्र रही हैं, इसलिए इतिहास को स्त्री की नज़र से देखना, इतिहास में गुमनाम हुए उन पात्रों को जीवन्त करने की कला उनके पास है। उन्होंने मिथिला के बड़े दर्शनिक वाचस्पति मिश्र की पत्नी भामती पर उपन्यास लिखा। उपन्यास में स्त्री स्वर को बहुत ही सहज ढंग से उठाया गया है। उनकी ख़ासियत है कि स्त्री मुद्दे पर अपनी बात कहने के लिए न नारा लगाती हैं, न परचम लहराती हैं। पर जो कहती हैं उसमें सच्ची आग और तड़प होती है। उनके उपन्यास भामती से-वाचस्पति काम में ऐसे लीन हुए कि उन्हें दीन-दुनिया की सुध ही नहीं रही।

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