जीने की राह श्रीमद्भगवद्गीता
Samay Patrika|August 2021
निस्संदेह श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। मैं समझता हूँ, लोकप्रियता में इससे बढ़कर कोई दूसरा ग्रंथ नहीं और मैं पिछले पचास वर्षों से निरंतर देख रहा हूँ कि इस दिव्य पुस्तक की लोकप्रियता आधुनिक विज्ञानवादी समाज में दिन-प्रति -दिन बढ़ती ही जा रही है। गीता के उपदेशों को समझने के बाद सभी ने खुले मन से इस दिव्य पुस्तक को स्वीकृत किया है, अतः मैं यह बहुत जिम्मेदारी से कह सकता हूँ कि श्रीमद्भगवद्गीता किसी संप्रदाय विशेष का ग्रंथ न होकर सभी का ग्रंथ है। मेरा अटूट विश्वास है कि
इंद्रेश कुमार

इसका दिव्य संदेश किसी जाति-संप्रदाय, भाषा, लिंग, दल, देश व सभ्यता विशेष के लिए सीमित न होकर, संपूर्ण मानव जाति के लिए ही नहीं, बल्कि प्राणिमात्र के लिए है, यानी सार्वभौमिक है। पाश्चात्य विद्वान् और ब्रिटिश दार्शनिक ऐलडस हक्सले ने गीता से प्रभावित होकर एक जगह लिखा है-भगवद्गीता मानव जाति के आध्यात्मिक विकास हेतु सबसे व्यवस्थित ग्रंथ है। यह बारहमासी दर्शन के सबसे स्पष्ट और व्यापक सारांशों में से एक है। इसलिए इसका स्थायी मूल्य न केवल भारत तक सीमित है, बल्कि इसका 'महत्त्व' संपूर्ण मानवता के लिए है। विश्व में आधुनिक विज्ञान के सबसे बड़े स्तंभ अल्बर्ट आइंस्टीन ने इस दिव्य पुस्तक के संदर्भ में लिखा है-जब मैं भगवद्गीता पढ़ता हूँ और इस खयाल को केंद्र बनाता हूँ कि भगवान् ने इस ब्रह्मांड को कैसे बनाया तो फिर बाकी सबकुछ बेमानी सा लगता है।' गीता का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति चाहे किसी भी वाद-मत अथवा सिद्धांत को माननेवाला क्यों न हो, उस व्यक्ति का प्रत्येक परिस्थिति में बस कल्याण हो जाए। किसी भी परिवेश, किसी भी परिस्थिति में परमात्म प्राप्ति से कोई वंचित न रह जाए।

मैं समझता हूँ, यही गीता का एकमात्र उद्देश्य है। शास्त्रानुसार मेरी यही मान्यता है कि मनुष्य योनि ही एक ऐसी योनि है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति का जन्म केवल 'परम कल्याण' अर्थात् परमार्थ यानी 'परमात्म प्राप्ति के लिए हुआ है। गीता की महत्ता को शब्दों में वर्णन करना, समझना और समझाना लगभग असंभव ही है, क्योंकि यह संवाद स्वयं भगवान् कृष्ण के मुखारविंद से निकला 'असीमित दिव्य तत्त्वज्ञान है और जो भी आस्थावान दिल से इस समंदर में गोता लगाता है, उसे निश्चय ही हर बार कुछ-न-कुछ नया मिल जाता है। जीवन भर इस समुद्र की थाह लेते रहने पर भी इसकी गहराई का अनुमान नहीं लगता, इसकी कहीं थाह नहीं मिलती। मैं समझता हूँ कि अगर दिव्य गीतारूपी अथाह समुद्र की दो अमृत बूंद भी किसी प्यासे को मिल जाएँ; मात्र दो बात ही अगर किसी की समझ में आ जाएँ तो समझो उसका जीवन सफल हो गया। गीता के दिव्य प्रभाव से गंभीर चिंतनशील व्यक्ति ज्ञानी व भगवद्विद्वेषी प्रेमिक बन जाता है तथा कर्मवीर अपने जीवन की उद्देश्य-सिद्धि के लिए सन्नद्ध हो वापस कर्मक्षेत्र में लौट आता है। ऐसा है दिव्य गीता का महत्त्व और प्रभाव; अतः कल्याण की इच्छा रखनेवाले हर इनसान के लिए परम आवश्यक है कि वह गीता को नियमित रूप से अवश्य पढ़े और दूसरों को भी पढ़ाए।

गीता की तत्त्व-विवेचना ब्रह्म या परमात्मा के आकार व निराकार में फर्क नहीं करती। अल्लाह, खुदा, भगवान्, वाहेगुरु, रब और ईश्वर में फर्क नहीं करती

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