'बैड मैन असल में एक गुड मैन है'
Samay Patrika|August 2021
बैड मैन- गुलशन ग्रोवर की आत्मकथा
महेश भट्ट

पिछले रामायण को इतना दिलचस्प राम नहीं, रावण बनाता है। बुद्धिमानी की ऐसी बातें मैंने पहली बार बचपन के दिनों में एक शांत सिनेमा हॉल के अँधेरे में सुनी थीं। इन बातों का पूरा मतलब मुझे बहुत बाद में समझ आया। मेरी माँ ने इस शाश्वत सत्य को उस वक्त घोषित किया था, जब वेफर्स कचरते हुए पूरे रोमांच के साथ हम संपूर्ण रामायण नाम की फिल्म में उस जमाने के सबसे बड़े विलेन बी.एम. व्यास को रावण की भूमिका निभाते देख रहे थे।

हीरो तो वीर होते ही हैं, पर आपको ऐसा नहीं लगता कि वे क्या करने वाले हैं, इसका अंदाजा पहले ही हो जाता है? अपने बड़े-बड़े काम से वे दुनिया को बचाते हैं और लोगों का दिल जीत लेते हैं। आप अच्छी तरह जानते हैं कि अंत में जीत उन्हीं की होगी, लेकिन आपकी कहानी में संघर्ष तो खलनायक ही लाता है। "आपकी मूवी का सबसे अहम किरदार आपका हीरो नहीं होता। हीरो के किरदार और उसकी प्रेमिका से अभिभूत होना छोड़ दो। अपना पूरा दिल एक जबरदस्त खलनायक को गढ़ने पर लगाओ, क्योंकि जैसा कि कहते हैं न, हर कामयाब फिल्म के पीछे एक बड़ा बैड मैन' होता है। यह बात एक बार मुझसे लेखक सलीम खान ने कही थी।

इस पुस्तक में हम जिस बैड मैन की जिंदगी को बेहद करीब से देखने जा रहे हैं, वह एक गुड मैन है। गुलशन ग्रोवर ने अपने कॅरियर की शुरुआत दिल्ली के बाहरी इलाकों में बेहद साधारण से माहौल में रामलीला के किरदार निभाने के साथ की थी। गुलशन तब महज पाँच साल का था, जब अपनी माँ की चुन्नी को उसने एक पोशाक की शक्ल दी और हनुमानजी की सेना के एक सैनिक का किरदार निभाया। इसके बदले में सैलरी के तौर पर उसे एक गिलास दूध और कुछ केले मिले थे! उसका प्रदर्शन इतना अच्छा था कि धीरे-धीरे उसे बड़े व बेहतर रोल मिलने लगे और देखिए, आज वह कहाँ पहुँच गया है! गुलशन ने करीब 500 फिल्में की हैं, जिनमें से 31 अंतरराष्ट्रीय फिल्में हैं। ब्रिटिश, कनाडाई, फ्रेंच, जर्मन और इटालियन फिल्में करने के अलावा वह पहला भारतीय अभिनेता है, जिसने पोलिश, मलेशियाई और ईरानी फिल्म में काम करने का असाधारण गौरव प्राप्त किया है।

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