यशस्वी भारत - राष्ट्रीयता हो संवाद का आधार
Samay Patrika|March 21
जिस समाज में संवाद नहीं है, वह आदि समाज कैसे आगे बढ़ेगा। संवाद उत्पन्न होने के लिए गंतव्य की स्पष्टता चाहिए। मैं कौन हूँ, इसकी स्पष्टता चाहिए, मुझे कहाँ जाना है और मैं कौन हूँ, उसके संदर्भ में परिस्थितियों का कैसे हमें विचार करना है, इसकी स्पष्टता चाहिए।
मोहन भागवत

छोट-छोट स्वार्थ सबके अलग-अलग हैं। विविधताओं से भरा हुआ देश है। पंथ, संप्रदाय, जाति, उपजाति, भाषा,प्रांत कितनी सारी बातें हैं। इन सबको एक रसायन के आधार पर उनकी विविधताविशेषता कायम रखते हुए और हजारों वर्षों से एक दिशा में चलनेवाली जो राष्ट्रीयता है, उसके आधार पर सबका विचार स्पष्ट हो, उसके आधार पर समाज में संवाद चले। स्वतंत्रता के बाद ऐसा होना चाहिए था, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ।

अपरिवर्तनीय है परिवर्तन का नियम

परिवर्तन यह अपरिवर्तनीय नियम है, ऐसा कहते हैं। समय के अनुसार यात्रा अपनी चलती रहे, इसलिए जो-जो परिवर्तन करना पड़ता है, वह करते हैं। वैसा ही 'पाञ्चजन्य और ऑर्गनाइजर 2 के बारे में हुआ है और थोड़ा पहले होता तो और अच्छा होता, लेकिन ठीक है। अब यह जो दृष्टि है कि समय के अनुसार कुछ बदलना है, वह दृष्टि स्थापित हो गई और चलती रहेगी। क्या परिवर्तन होना चाहिए, कहाँकहाँ आगे बढ़ना चाहिए, यह कैसा चलना चाहिए, गोयनकाजी स्वयं पत्रकारिता में इतने वर्षों से काम कर रहे हैं कि मैं नहीं मानता हूँ कि उनसे अधिक सलाह और कोई देगा। मैं एक दूसरी बात कहने के लिए खड़ा हूँ। परिवर्तन यह एक अपरिवर्तनीय नियम है, परंतु परिवर्तनशील दुनिया का जो मूल सत्य है, वह शाश्वत है और वह अपरिवर्तनीय है। परिवर्तन हितकारी हो, इसलिए अपरिवर्तनीय जो है, उसका मान रखकर चलना पड़ता है। तभी परिवर्तन भी सफल होता है।

'पाञ्चजन्य' और 'ऑर्गनाइजर के कार्यकर्ताओं को यह बताने की आवश्यकता नहीं है, मैं केवल स्मरण दिला रहा हूँ। समाचार-पत्र, प्रचार-पत्र, विचारपत्र, एक-एक प्रकार को चलाना भी बहुत कठिन हो गया है। ऐसे समाचार-पत्र की अथवा प्रचार-पत्र की अथवा विचार-पत्र की चिंता करनेवाले अच्छे-अच्छे व हट्टेकट्टे लोगों को लगता था कि आजचट्टान जैसे ये जो खड़े हैं, कोई हवा इनको डिगा नहीं सकती, लेकिन ऐसी चिंता करने से काम उनके पास आ गया तो नींद की गोलियाँ खाना उनका प्रारंभ हो जाएगा, यह मैंने स्वयं देखा है। इसलिए यह यात्रा कठिन है। परंतु तीनों की थोड़ी-थोड़ी भूमिका निभाते हुए और उनको चलाते रहना, यह और भी कठिन है। यह कार्य इतने दिनों से कर रहे हैं, उसकी आदत हो गई है। अनुकूलता में ही ज्यादा सावधान रहना पड़ता है। कठिनाइयों में तो कैसे चलना है, इसकी तो बहुत आदत है। अनुकूलता उत्पन्न हुई तो कभी-कभी यह लगता है कि संकट आया, गया। ऐसा न लगने देते हुए और पर्याप्त सावधानी रखकर इन सबको करना पड़ता है, वह भी करना पड़ेगा।

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