बचपन में हुए सेक्सुअल अब्यूज का महिलाओं की मैरिड लाइफ पर असर
Vanitha Hindi|December 2020
बाल यौन उत्पीड़न औरत के वैवाहिक जीवन को किस तरह प्रभावित करता है। क्या वह सामान्य जीवन जी पाती है। जानिए कुछ केस स्टडीज, रिसर्च और एक्सपर्ट की राय
रूबी मोहंती

भारत में मौजूदा कानूनी प्रावधान पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस) के अनुसार बच्चे को गलत तरीके से छूना, उसके सामने गलत हरकत करना और अश्लील चीजें दिखाना-सुनाना भी इसी दायरे में आता है। इसमें यौन उत्पीड़न, रेप, सेक्सुअल असॉल्ट, पीछा करना और ऑनलाइन सेक्सुअल अब्यूज जैसी बातें भी शामिल हैं। नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2018 में हर दिन 109 बच्चे यौन उत्पीड़न का शिकार हुए हैं। हर साल इसका आंकड़ा बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में 32,608 केस सामने आए थे, जबकि 2018 में यह संख्या 22 प्रतिशत ज्यादा थी। इनमें लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले कहीं ज्यादा थी। इसकी वजह चाहे बहुत सारी हों, पर इन बच्चियों की जब शादी होती है, तब इनके साथ कई तरह की मानसिक और शारीरिक समस्याएं आती हैं। मनोचिकित्सकों और स्त्री रोग विशेषज्ञों के पास आए दिन इन मरीजों संख्या बढ़ रही है, जो अपने पति के साथ जांच और काउंसलिंग के लिए आती हैं। पर सच क्या है, यह बात तो वह खुद और उसकी डॉक्टर जानती है। उनकी मैरिड लाइफ जिस तरह प्रभावित होती है, यह मनोचिकित्सकों और स्त्री रोग विशेषज्ञों के लिए गंभीर विषय है।

कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल गुड़गांव की वरिष्ठ मनोचिकित्सक श्वेता शर्मा के मुताबिक सेक्सुअल अब्यूज में 2 तरह से बातें सामने आती हैं। 100 में 70 स्त्रियां उत्पीड़न के बाद चुप हो जाती हैं और 30 प्रतिशत केस में वे ज्यादा सेक्सुअली एक्टिव हो जाती हैं। लड़कियों से यौन उत्पीड़न की वजह उनकी खुद की फैमिली से ही जुड़ी होती है। बच्ची को अपनी ही मां बदनामी के डर से चुप करा देती है। वह चुप हो जाती है, उसकी शादी भी हो जाती है। शादी के बाद वह कभी सहज नहीं होती।

शरीर अपना सा नहीं लगता

मनोचिकित्सक अपनी यौन पीड़ित मरीज को कई सिटिंग के बाद यह अहसास और विश्वास दिला पाते हैं कि उसका शरीर किसी और का नहीं, बल्कि उसका अपना है। पीड़ित स्त्री को उत्पीड़न के बाद हमेशा लगता रहता है कि उसका शरीर अपना नहीं है। शादी के बाद स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। तब उसे लगता है कि शरीर पर उसका हक नहीं रहा। अब हक पति का है। पति उसकी भावनाओं की कद्र नहीं करता। मानसिक और शारीरिक संतुष्टि की परवाह किए बगैर अपनी संतुष्टि को अहमियत देता है। यह स्थिति स्त्री के लिए भयंकर होती है। बचपन का यौन उत्पीड़न और पति का व्यवहार उसे वस्तु की तरह महसूस कराता है। कड़वे अनुभव स्त्री को कमजोर बना देते हैं।

टॉर्चर का फ्लैश बैक

डरी-सहमी औरत की खास परेशानी है कि शादी के बाद पति के साथ सेक्स के दौरान या इंटीमेसी के दौरान बचपन की वीभत्स यादें उसका पीछा नहीं छोड़ती। इसलिए अंतरंग क्षणों में जैसे ही आंखें बंद होती हैं, उसके मन में वह भयावह हादसा उभरने लगता है। जैसे ही फोरप्ले शुरू होता है, पति का मीठा स्पर्श जबर्दस्तीवाला अहसास बन कर मन में हावी होने लगता है। मन में यह तय होता है सेक्सुअल प्लेजर में कोई आनंद नहीं, बल्कि दर्द और बुरा अहसास ही होगा। वह अपना बीता खौफनाक बचपन पति से शेअर नहीं करती। बहुत हद तक इस उत्पीड़न में घर का सदस्य ही इन्वॉल्व होता है। वह पति के साथ शारीरिक तौर पर साथ तो होती है, पर मन से नहीं हो पाती।

इंटीमेसी के दौरान असर

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