किसे अपना कहें
Vanitha Hindi|March 2020
निर्मला जी की मृत्यु पर उनके बेटे-बेटी जिस तरह नकली आंसू बहा रहे थे, वह कमला के लिए असह्य था। कौन थी यह कमला, जो निर्मला जी के बेहद करीब थी?
रीता कुमारी

निर्मला वर्मा के कोमा में जाने की बात सुनते ही उनके परिचितों और रिश्तेदारों से हॉस्पिटल का परिसर भरने लगा था। जिस किसी को भी उनके विषय में मालूम होता, उन्हें देखने के लिए आ ही जाता। निर्मला जी थीं ही ऐसी, उनका कोमल पारदर्शी और सौम्य स्वभाव सबको भाता था। सबके दुख में दुखी और सबके सुख में सुखी रहती थीं।

पति की मृत्यु के बाद अपने दोनों बेटों मधुकर व नमन तथा बेटी कृष्णा के साथ 30 बरस पहले जिस छोटे से मोहल्ले में आ बसी थीं, वह जल्द ही उनके परिवार की तरह हो गया था। जब वे स्कूल से आ कर ट्यूशन के लिए जाती, मकान मालकिन गायत्री देवी उनके बच्चों का ख्याल रखती। फिर उन्हें मिल गयी थी कमला, जिसके पति ने उसे छोड़ कर दूसरी शादी कर ली थी। कमला अपने 5 वर्ष के बेटे नवीन का पालन-पोषण करने के लिए घर-घर काम करती थी। जब वह निर्मला जी के यहां काम करने लगी, उन्हीं के घर की हो कर रह गयी। निर्मला जी उसके व उसके बच्चे की देखभाल करने लगीं, तो कमला उनके घर व बच्चों की। विपत्ति के बेहद कठिन समय में दोनों औरतों को एक-दूसरे का सहारा मिल गया था।

इन दोनों औरतों का जीवन चाहे जितना संघर्षपूर्ण और झंझावतों से भरा रहा हो, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और उनके स्वास्थ्य का दोनों मिल कर पूरा ख्याल रखतीं। इनके प्रयासों से ही बच्चे सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए। मधुकर केरल के स्पेस सेंटर में वैज्ञानिक बना और नमन इनकम टैक्स अधिकारी बन गया। कृष्णा अपने डॉक्टर पति के साथ इंग्लैंड चली गयी। कमला का बेटा नवीन बैंक अधिकारी बन गया था और पटना में ही अपने बैंक के पास ही मकान ले कर रह रहा था। एक-एक करके सभी की शादियां भी हो गयीं। निर्मला वर्मा और कमला अभी भी उसी मोहल्ले में रहती थीं। बस अंतर इतना था कि वहीं पर निर्मला जी ने अपना घर खरीद लिया था।

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि 2 दिनों पहले अचानक निर्मला जी को दिल का दौरा पड़ा, जिससे उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट करवाना पड़ा। उनकी हालत को देखते हुए डॉक्टरों की सलाह पर कमला ने तत्काल निर्मला जी के तीनों बच्चों को सूचित कर दिया। काल के आने की आहट का आभास होते ही तीनों बच्चे पटना आ पहुंचे थे। तीनों मां के पास बैठे उन्हें कोमा से बाहर लाने की कोशिश कर रहे थे। कृष्णा के बार-बार यह कहने पर कि "मां... उठिए। देखिए आपके सभी बच्चे आपके पास आए हैं...'' निर्मला जी पर कोई असर नहीं हो रहा था। सभी की कोशिशें व्यर्थ होते देख कर मधुकर बोला, "मां, सारी उम्र हम लोगों की जिंदगी संवारने के लिए संघर्ष करती रहीं, अब जब उनके सुख के दिन आए वे हम सबों को छोड़ कर जाने की तैयारी में हैं। काश ! मैं उनके किसी काम आता, तो मेरा जीवन सफल हो जाता।"

उसकी बातें सुन वहां खड़े लोग उसके बड़प्पन से प्रभावित हो कर कह रहे थे कि बच्चे हों तो निर्मला जी के बच्चों की तरह। बहुतों को तो मन ही मन निर्मला जी की किस्मत से रश्क हो रहा था। वहां खड़े लोग निर्मला जी के बेटे-बेटी की बड़ाई में चाहे कितने ही कसीदे पढ़ें, पर एक शख्स वहां ऐसा था, जिसका कलेजा यह सब सुन कर खुश होने के बदले छलनी हो रहा था। वह थी कमला। मधुकर की झूठी बड़ाई उससे सुनी नहीं जा रही थी।

तभी कृष्णा की आवाज उसके कानों में पिघले शीशे की तरह पड़ी, "मां... आप नहीं रहेंगी, तो हम लोग किसके पास आएंगे। आपसे ही तो मेरा मायका था, मेरा मायका मुझसे दूर मत कीजिए। अभी हमें छोड़ कर मत जाइए।"

उसे चुप कराने के लिए कई लोग आगे बढ़े। वहीं कमला बाई सब सुनती रही, पर उसने एक कदम भी कृष्णा को सांत्वना देने के लिए आगे नहीं बढ़ाया। उसका मन तो उस अतीत के गलियारे में भी भटक रहा था, जहां कृष्णा की धूर्ततापूर्ण टेढ़ी चाल याद कर उसका सर्वांग सुलग रहा था। जो कृष्णा आज अपनी मां के लिए जार-जार रो रही थी, कभी अपनी मां को उसने ऐसे ही जार-जार रुलाया था।

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