बिहार विधानसभा चुनाव सियासी चक्रव्यूह में फंसे तेजस्वी
Saras Salil - Hindi|November Second 2020
महाभारत की लड़ाई में कौरवों ने किस तरह अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसा कर मारा होगा, इस की मिसाल बिहार विधानसभा चुनाव में अलग तरीके से देखने में आई, जिस में राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया तेजस्वी यादव जीततेजीतते रह गए.
भारत भूषण श्रीवास्तव

अभिमन्यु की मौत के समय उस के पिता अर्जुन, जिस के नाम से कौरव कांपते थे, को कौरवों ने मायाजाल रच कर दूर भेज दिया था. बिहार के महाभारत में भी यही हुआ कि तेजस्वी यादव के पिता लालू प्रसाद यादव चारा घोटाला मामले में जेल में बंद थे, इसलिए बेटे को सियासी चक्रव्यूह फंसने से बचने के गुर नहीं बता पाए, लेकिन इस के बाद भी तेजस्वी यादव ने अभिमन्यु की तरह ही हिम्मत और बहादुरी से चुनावी लड़ाई लड़ी.

बिहार में जो भी हुआ रातोंरात नहीं हुआ, बल्कि इस चक्रव्यूह की स्क्रिप्ट को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 3 साल पहले ही लिखना शुरू कर दिया था, जिस का अंत जद (यू) और भाजपा का गठबंधन बनने के साथ हुआ.

साल 2015 के चुनाव नतीजों पर नजर डालें तो वोटर ने हैरतअंगेज तरीके से भाजपा को खारिज कर दिया था, जबकि उन दिनों लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शोहरत शबाब पर थी.

उस चुनाव में जद (यू), राजद और कांग्रेस मिल कर लड़े थे और उन के महागठबंधन ने 243 सीटों में से 178 सीटें जीती थीं. सब से ज्यादा राजद को 18.8 फीसदी वोटों के साथ 80 सीटें मिली थीं.

जद (यू) को 17.3 फीसदी वोटों के साथ 71 सीटें और कांग्रेस महज 6.8 फीसदी वोटों के साथ 27 सीटें ले गई थी.

यों बदले समीकरण

जरूरत से ज्यादा उम्मीद लगाए बैठी भाजपा को वोट तो सब से ज्यादा 25 फीसदी मिले थे, लेकिन उसे 53 सीटों से ही तसल्ली करनी पड़ी थी. तब उस के सहयोगी दल रामविलास पासवान की लोजपा 5 फीसदी वोटों के साथ 2 सीटों पर, उपेंद्र कुशवाह की रालोसपा 2.6 फीसदी वोट ले कर 2 सीटों पर और जीतनराम मांझी की हम पार्टी एक सीट पर सिमट कर रह गई थी.

इस नतीजे से न केवल भाजपा को, बल्कि सभी दलों और सियासी पंडितों को यह समझ आ गया था कि भाजपा को सवर्ण वोट तो थोक में मिले, लेकिन एससीबीसी समाज के लोगों ने उस पर रत्तीभर भी भरोसा नहीं किया, जिस की एक अहम वजह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत का वह बयान था कि जातिगत आरक्षण पर दोबारा सोचविचार होना चाहिए.

पर, इस बार के नतीजों में भाजपा की सीटें तो बढ़ कर 74 हो गई हैं, लेकिन उस का वोट फीसदी घट कर 19.4 फीसदी रह गया है. इस के उलट राजद का वोट फीसदी बढ़ कर 23.05 हो गया है, लेकिन सीटें 75 रह गईं.

जद (यू) की सीटें भी कम हुईं और वोट फीसदी भी कम हुआ. उसे 43 सीटों के साथ 15.41 फीसदी वोट मिले. कांग्रेस सीटों के मामले में घाटे में रही, लेकिन वोटों के मामले में फायदे में रही. उसे 19 सीटें और 9.55 फीसदी वोट मिले.

पिछले चुनाव में की गई अपनी कई गलतियों से सबक सीखते हुए भाजपा को नीतीश फोड़ना बेहतर लगा, जो आसानी से तैयार भी हो गए. दरअसल, नीतीश कुमार की इमेज बिगड़ने लगी थी, क्योंकि वे बिहार की जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पा रहे थे. इस के उलट तेजस्वी यादव तेजी से युवा नेता की हैसियत से बिहारियों के दिल में जगह बनाने लगे थे. हालांकि कुछ दिन वे राजनीतिक पिक्चर से गायब भी रहे, लेकिन जब जद (यू) और भाजपा गले मिले तो उन्हें समझ आ गया कि चाचा नीतीश ने एक बार फिर पलटी मार दी है. लिहाजा, वे सक्रिय होने लगे.

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