होमो लूडेन्स- खिलन्दड़ मानव
Shaikshanik Sandarbh|March - April 2021
यो ज़े दे ब्लोक के साथ हुई अपनी बातचीत के कई दिनों बाद तक मेरा दिमाग इसी सवाल पर बार-बार वापस लौटता रहा: अगर सारा समाज भरोसे पर आधारित होता, तो कैसा होता?
रुत्खेर ब्रेख्मान

मैं सोचता था कि इतने बड़े पैमाने का यू-टर्न लेने के लिए हमें शुरू से शुरू करना होगा। हमें बच्चों के साथ शुरुआत करनी होगी। लेकिन जब मैंने शैक्षणिक साहित्य में गोता लगाया, तो मुझे कुछ कठोर तथ्यों का सामना करना पड़ा। पिछले दशकों के दौरान बच्चों की स्वाभाविक प्रेरणाशक्ति का विधिवत गला घोंटा गया है। वयस्क बच्चों का समय होमवर्क, व्यायाम, संगीत, नाटक, ट्यूशन, परीक्षा की तैयारी जैसी अन्तहीन गतिविधियों से भरते रहते हैं। इसका मतलब है कि एक गतिविधि के लिए उनके पास बहुत कम समय बचता है: खेल के लिए। और खेल शब्द का इस्तेमाल में व्यापक अर्थ में कर रहा हूँ किसी भी ऐसी जगह जाने की आज़ादी जहाँ बच्चों को उनकी जिज्ञासा ले जाती हो। खेलने और ढूँढ़ निकालने की आज़ादी, प्रयोग करने और रचने की आज़ादी। अभिभावकों या अध्यापकों द्वारा तय कर दिए गए रास्ते पर चलकर नहीं, बल्कि यूँ ही। मज़े की खातिर।

आप कहीं भी नज़र डालें, हर जगह बच्चों की आज़ादी सीमित की जा रही है। 1971 में ब्रिटेन के सात और आठ साल के बच्चे खुद-ब-खुद पैदल चलकर स्कूल जाया करते थे। आजकल महज़ 10 प्रतिशत बच्चे ऐसा करते हैं। दस देशों के बारह हज़ार अभिभावकों के बीच किए गए जनमतसंग्रह से यह बात सामने आई है कि कैदी उससे ज़्यादा समय बाहर बिताते हैं जितना बच्चे बिताते हैं। मिशिगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया था कि बच्चों द्वारा स्कूल में बिताए गए समय में 1981 से 1997 तक 18 प्रतिशत का इजाफा हुआ था।

इन घटनाओं पर समाजविज्ञानियों और मनोवैज्ञानिकों ने समान रूप से चेतावनी जाहिर की है। एक दीर्घकालीन अमेरिकी अध्ययन ने बच्चों में एक निरन्तर ह्रासमान 'इंटरनल लोकस ऑफ कंट्रोल' लक्ष्य किया था, यानी वे उत्तरोत्तर यह महसूस कर रहे थे कि उनके जीवन दूसरे लोगों द्वारा नियंत्रित किए जा रहे थे। संयुक्त राज्य अमेरिका में यह बदलाव इतने बड़े पैमाने का रहा कि 2002 में एक औसत बच्चा 1960 के दशक के 80 प्रतिशत बच्चों के मुकाबले कम ‘आत्मनियंत्रित महसूस करता था।

हालाँकि, मेरे अपने देश में ये आँकड़े इतने ज्यादा चौंकाने वाले नहीं हैं, तब भी रुझान वैसा ही है। 2018 में हॉलैण्ड के शोधकर्ताओं ने पाया था कि दस में से तीन ही बच्चे ऐसे थे जो या तो हफ्ते में एक बार बाहर खेलने जाते थे या जाते ही नहीं थे। इस बीच, ओईसीडी (वैश्विक थिंक टैंक) द्वारा स्कूली बच्चों के बीच किए गए एक व्यापक सर्वेक्षण से यह बात सामने आई थी कि जितने भी मुल्कों में वह सर्वेक्षण किया गया था, उनमें हॉलैण्ड के बच्चे सबसे कम उत्प्रेरित थे। परीक्षाओं और रिपोर्ट-कार्डों ने इन बच्चों की स्वाभाविक उत्प्रेरणाओं को इस कदर कुन्द कर दिया था कि जब उनका सामना अध्यापक द्वारा सौंपी गई किसी ऐसी ज़िम्मेदारी से होता था जिसमें कोई श्रेणी (ग्रेड) मिलने वाली नहीं होती थी, तो उनकी एकाग्रता कपूर की तरह उड़ जाती थी।

बच्चों की बढ़ती निगरानी

और इस सबसे बड़े बदलाव के बारे में तो कहना ही क्या जिसके तहत अभिभावक अपने बच्चों के साथ बहुत ज़्यादा वक्त बिताते हैं। उन्हें पढ़ाने में। उनके होमवर्क में मदद करने में। उन्हें खेल का अभ्यास कराने ले जाने में। नीदरलैंण्ड्स में इन दिनों इस तरह की अभिभावकीय देखभाल पर खर्च किए जाने वाले समय में 1980 के दशक के मुकाबले 150 प्रतिशत से ज़्यादा की वृद्धि हुई है। संयुक्त राज्य अमेरिका में आज कामकाजी माताएँ अपने बच्चों के साथ उससे ज़्यादा समय बिताती हैं जितना 1970 के दशक में गृहणी माताएँ बिताया करती थीं।

क्यों? इस बदलाव के पीछे क्या चीज़ है? ऐसा नहीं है कि अभिभावकों को अचानक अपरिमित समय हाथ लग गया है। स्थिति, इसके विपरीत, यह है कि 1980 के दशक के बाद से अभिभावकों को हर कहीं बहुत ज़्यादा काम करना पड़ रहा है। हो सकता है रहस्य इसी चीज़ में छिपा हो: तमाम अन्य चीज़ों की कीमत पर काम पर हमारी अस्वाभाविक एकाग्रता। जैसेजैसे शिक्षा के नीति-निर्माता श्रेणी-निर्धारण (रैंकिंग) और वृद्धि (ग्रोथ) को प्रोत्साहित करते गए हैं, वैसे-वैसे अभिभावक और स्कूल परीक्षाओं और परीक्षा-परिणामों में तल्लीन होते गए हैं।

अब बहुत कम उम्र में बच्चों की कोटियाँ निर्धारित की जाने लगी हैं। एक कोटि में वे बच्चे आते हैं जो योग्यता और सम्भावनाशीलता का अम्बार लगाते रहते हैं, और दूसरी कोटि में वे बच्चे आते हैं जो कम योग्य और कम होनहार माने जाते हैं। अभिभावकों को चिन्ता सताती है: कहीं मेरी बेटी में कुछ कमियाँ तो नहीं हैं? क्या मेरा बेटा अपने सहपाठियों के साथ कदम मिलाकर चल पा रहा है? क्या उन्हें किसी विश्वविद्यालय में दाखिला मिल पाएगा? 10,000 अमेरिकी छात्रों के बीच किए गए हाल ही के एक अध्ययन से यह तथ्य उजागर हुआ है कि 80 प्रतिशत छात्रों का सोचना है कि उनके अभिभावक करुणा या दया जैसे गुणों की बजाय अच्छे ग्रेड की ज़्यादा चिन्ता करते हैं।

इसी के साथ-साथ एक व्यापक अहसास यह बना हुआ है कि कोई मूल्यवान चीज़ हाथ से फिसलती जा रही है। जैसे कि स्वतःस्फूर्तता। और खिलन्दड़ापन। एक अभिभावक के रूप में आप पर लगातार ऐसी सलाहों की बौछार होती रहती है कि आपको उपलब्धि के दबावों का सामना करने के लिए खुद को और अपने बच्चे को किस तरह तैयार करना चाहिए। एक पूरी-की-पूरी विधा इस पर केन्द्रित है कि किस तरह काम कम किया जाए और सचेत ज़्यादा रहा जाए। लेकिन अगर थोड़ा-सा स्वावलम्बन पर्याप्त न हुआ तो?

जो ढर्रा चल रहा है, उसकी बेहतर समझ के लिए ज़रूरी है कि हम खेल के अपने अभिप्राय को स्पष्ट करें। खेल तयशुदा नियमों-विनियमों के अधीन नहीं होता, बल्कि किसी भी तरह की सीमाओं और बन्धनों से मुक्त होता है। यह नकली घास से तैयार किया गया मैदान नहीं होता जिसके चारों ओर चिल्लाते हुए अभिभावक बैठे रहते हैं। यह अभिभावकों के निरीक्षण से मुक्त घर से बाहर बच्चों की उछल-कूद और मौज-मस्ती होती है, जिस दौरान वे अपने खेल खुद ही रचते चलते हैं।

जब बच्चे इस तरह का खेल खेलते हैं, तो वे खुद ही सोचते हैं। वे जोखिम उठाते हैं और नियमों का पालन नहीं करते, रचनात्मक ढंग से सोचते हैं और परिपाटियों से हटकर आचरण करते हैं, और इस प्रक्रिया में अपनी दिमागी काबिलियत और उत्प्रेरणा में वृद्धि करते हैं। उन्मुक्त क्रीड़ा ऊब का कुदरती इलाज भी होती है। आजकल हम बच्चों को मशीनों द्वारा गढ़े गए तमाम तरह के मनोरंजन उपलब्ध कराते हैं विभिन्न हिस्सों को आपस में जोड़ने के सम्पूर्ण निर्देशों से युक्त लेगो स्टार वॉर्स स्नोस्पीडर से लेकर पकने की इलेक्ट्रॉनिक आवाज़ों से युक्त मिली किचन गुर्मेट डीलॅक्स (Gourmet Deluxe) तक।

सवाल यह है कि अगर हर चीज़ पहले से निर्मित है, तब क्या हम अपनी खुद की जिज्ञासा और कल्पनाशक्ति को विकसित कर सकते हैं? क्या ऊब रचनात्मकता का स्रोत हो सकती है? मनोवैज्ञानिक पीटर ग्रे लिखते हैं कि 'आप रचनात्मकता की शिक्षा नहीं दे सकते। आप सिर्फ इतना ही कर सकते हैं कि उसे फलने-फूलने दें।

खेल का अतिशय महत्व

जीवविज्ञानी इस बात को लेकर एकमत हैं कि खेलने की प्रवृत्ति की जड़ें हमारे स्वभाव में गहरे तक फैली हुई हैं। लगभग सारे स्तनधारी जीव खेलते हैं, और बहुत-से अन्य प्राणी भी खुद को खेलने से नहीं रोक पाते। अलास्का के कौए-नुमा परिन्दे रेवन बर्फ से ढंके छप्परों पर बैठकर भनभनाने जैसी आवाज़ करते हैं। ऑस्ट्रेलिया के एक समुद्र-तट पर मगरमच्छ मौज-मस्ती के लिए लहरों पर तैरते हुए देखे गए हैं, और कनाडा के वैज्ञानिकों ने ऑक्टोपसों को दवा की खाली बोतलों पर पानी के फव्वारे छोड़ते देखा है।

ऊपरी तौर पर, खेल समय का अच्छा-खासा दुरुपयोग लग सकता है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज़्यादा अक्लमन्द प्राणियों में सबसे ज़्यादा खिलन्दड़ा व्यवहार देखने मिलता है। पिछले अध्याय में हमने देखा था कि पालतू जानवर जीवन-भर खेलते ही रहते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि बचपन का जितना अधिक आनन्द होमो पप्पी लूटता है उतना प्राणियों की कोई प्रजाति नहीं लूटती। हॉलैण्ड के इतिहासकार हुइज़िंगा ने 1938 में लिखा था कि क्रीड़ा जीवन को अर्थ प्रदान करती है। उन्होंने हमें होमो लुडेन्स 'खिलाड़ी मानव' की संज्ञा दी थी। हुइजिंगा ने कहा था कि "जिसे हम ‘संस्कृति' कहते हैं, उसकी हर चीज़ का उद्गम क्रीड़ा में है।"

नृविज्ञानियों का अनुमान है कि ज़्यादातर मानव-इतिहास के दौरान बच्चों को उनकी मर्जी के मुताबिक ज़्यादा-से-ज्यादा खेलने की इजाज़त मिली हुई थी। खेल की संस्कृति हर कहीं एक-जैसी प्रतीत होती है, भले ही इस मामले में शिकारी-संग्रहकर्ताओं की अलग-अलग संस्कृतियों के बीच के फर्क विचारणीय हों। शोधकर्ताओं का कहना है कि सबसे महत्वपूर्ण बात युवाओं को उपलब्ध कराई गई अपरिमित स्वतंत्रता थी। चूँकि घूमन्तू लोग शायद ही कभी महसूस करते हैं कि वे बच्चों के विकास को नियंत्रित कर सकते हैं, इसलिए बच्चों को सुबह से देर रात तक, दिन-भर खेलने की छूट मिली होती है।

लेकिन अगर बच्चे कभी स्कूल नहीं जाते, तो क्या वे वयस्क जीवन जीने के लिए तैयार होते हैं? इसका जवाब यह है कि इन समाजों में खेलना और सीखना एक ही चीज़ है। शिशुओं को चलना या बोलना सीखने के लिए परीक्षाओं और श्रेणियों की ज़रूरत नहीं पड़ती। ये काबिलियतें उनमें कुदरती ढंग से आती हैं, क्योंकि वे दुनिया को जानने-समझने के लिए बहुत उत्सुक होते हैं। इसी तरह, शिकारी-संग्रहकर्ताओं के बच्चे खेलखेल में सीखते हैं। कीड़े पकड़ना, धनुष-बाण बनाना, जानवरों की आवाज़ों की नकल करना जंगल में करने लायक बहुत कुछ होता है। और जीवित बने रहने के लिए वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं के ज़बरदस्त ज्ञान की ज़रूरत होती है।

इसी तरह, साथ खेलते हुए बच्चे आपस में सहयोग करना सीखते हैं। शिकारी-संग्रहकर्ताओं के बच्चे मिलेजुले समूहों में खेलते हैं, जिनमें हर उम्र के लड़के और लड़कियाँ शामिल होते हैं। छोटे बच्चे बड़े बच्चों से सीखते हैं, जो अपना ज्ञान दूसरों को देने की ज़िम्मेदारी महसूस करते हैं। आश्चर्य की बात नहीं कि इन समाजों में प्रतिस्पर्धात्मक खेल लगभग असामान्य चीज़ होती है। वयस्कों की खेल-स्पर्धाओं से भिन्न, ये उन्मुक्त खेल खिलाड़ियों से निरन्तर समझौतों की माँग करते हैं। और अगर कोई नाखुश हो जाता है, तो खेल को रोक देने की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है (लेकिन तब हर कोई आनन्द से वंचित हो जाता है)।

***

ब से मनुष्यों ने एक जगह पर टिककर रहना शुरू किया तब से खेलों की संस्कृति में मूलभूत बदलाव आया।

सभ्यता का अभ्युदय बच्चों के लिए खेतिहर मजदूरी की दिमाग को कुन्द कर देने वाली गुलामी के साथसाथ यह विचार भी लेकर आया कि बच्चों को कुछ-कुछ उसी तरह विकसित करने की ज़रूरत है जिस तरह टमाटर के पौधे विकसित किए जाते हैं। क्योंकि अगर बच्चे जन्मजात रूप से दुष्ट हुए, तो आप उनको उनकी मर्जी पर नहीं छोड़ सकते। इसलिए उन्हें सबसे पहले उस सभ्यता के मुलम्मे की ज़रूरत पड़ी, और इसके लिए अक्सर एक सख्त नियंत्रण ज़रूरी हो जाता था। यह अभी हाल ही में, हमारे कृषक और नगर-वासी पूर्वजों के दिमाग में उपजी धारणा है कि बच्चों पर हाथ उठाया जा सकता है।

आरम्भिक नगरों और राज्यों के उद्भव के साथ ही आरम्भिक शिक्षाप्रणालियों का जन्म हुआ था। चर्च के लिए धर्मपरायण अनुयायियों की, सेना के लिए वफादार सैनिकों की और सरकार के लिए कड़ी मेहनत करने वाले कर्मचारियों की जरूरत पड़ी। तीनों इस बारे में एकमत थे कि खेल शत्रु है। अंग्रेज़ पादरी जॉन वेस्ले (1703-91) ने अपने स्कूल के लिए तैयार की गई नियमावली में निर्देश अंकित किया था कि 'न ही हम खेलने के लिए वक्त की छूट देते हैं। जो लड़कपन में खेलता है, वह आदमी बन जाने पर भी खेलता ही रहता है।

शिक्षा की जकड़न

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