मेरा रोज़नामचा: शिक्षा के बारे में सीखना
Shaikshanik Sandarbh|January - February 2021
"तो क्या,” उन्होंने कहा, “तुम छोड़ना क्यों चाहते हो?" “बच्चे तो हर जगह बच्चे होते हैं,” उन्होंने समझाया। मैं सहमत था। "लेकिन क्या हम इस गैर-बराबर और अन्यायी शिक्षा व्यवस्था से आँखें चुरा सकते हैं?” मैंने पूछा।- वैली स्कूल में एक बातचीत
शेषागिरी केएम राव

मैंने 1995 में वैली स्कूल छोड़ने का 'फैसला कर लिया। इसलिए नहीं कि मुझे वहाँ मज़ा नहीं आ रहा था। मज़ा तो बहुत आ रहा था। लेकिन कुछ था जो मुझे कचोट रहा था। स्कूल तो ऐसी शिक्षा को अपनाने की भरसक कोशिश करता था जो बच्चे के सर्वोत्तम हित में हो। लेकिन मुझे लगता था कि हम बाकी दुनिया से कटे हुए हैं। शहर से बाहर हरा-भरा, सुन्दर और नैसर्गिक 100 एकड़ का यह इलाका स्कूलों के एक विशाल समुद्र के बीच एक अलग-थलग टापू जैसा था। इनमें से कुछ स्कूल तो एकदम पड़ोस में भी थे। कुछ स्कूल सरकारी थे जो उपेक्षा के गवाह थे। अक्सर उनमें पर्याप्त शिक्षक नहीं होते थे, दीवारें जर्जर थीं और वे काफी मायूसी पैदा करते थे।

मुझे काफी तल्खी से लगता था कि इसके बारे में कुछ करना चाहिए। कभी-कभी मैं सोचता था कि चन्ना क्या करते। मुझे काफी निराशा हुई कि वैली में ज़्यादा लोग इस सवाल से जूझने को तैयार नहीं थे। वे कहा करते थे, “हमें तो अपना घर ठीक-ठाक रखना चाहिए।” यह तो गोल चक्कर में घूमने जैसा था, क्योंकि अपना घर ठीक-ठाक रखने जैसी कोई चीज़ थी नहीं: हमेशा कुछ-न-कुछ अधूरा रह ही जाता है।

रोज़ाना, मैं देखता था कि बच्चे नंगे पैर घाटी पार करके ताटगुणी (Thatguni) स्थित अपने मिडिल स्कूल जा रहे हैं। अधिकांश बच्चे पड़ोस के राचेनमादा (Rachenmada) गाँव के थे जहाँ सिर्फ प्राथमिक स्कूल था। एक बार तो मैं अपने सातवीं कक्षा के बच्चों को राचेनमादा ले भी गया था। कई तो पहली बार किसी गाँव गए थे। वैली में अपने दूसरे साल के दौरान हमने एक छोटा-सा कदम उठाते हुए ताटगुणी और राचेनमादा स्कूलों के छात्रों और शिक्षकों को हमारे विज्ञान दिवस जलसे में आमंत्रित भी किया था। उन्हें बहुत अच्छा लगा था, रहस्यमयी IT दुम भी। उन्होंने यही कहा था। मैं बहुत खुश था।

शिक्षा की यात्रा में बदलाव

मुझे समझ में आने लगा था कि हमारा समाज जिस ढंग से अपने बच्चों को शिक्षा देता है, उसमें गहरी गैर-बराबरी है। इधर मैं था जो एक ऐसे स्कूल में काम कर रहा था जो अपने बच्चों, जो सम्पन्न परिवारों से आए थे, को इतना कुछ देता था। लेकिन हमारे एकदम पड़ोस में ऐसे स्कूल थे जो इतने अलग लगते थे। अन्तर बहुत गहरे थे। मैं एक ऐसे स्कूल में काम करता था जिसका सरोकार यह था कि बच्चे की सम्भावनाओं को अधिक-से-अधिक साकार किया जाए। हमारे इस टापू के बाहर ऐसे कई स्कूल थे, सरकार द्वारा संचालित कई स्कूल थे, जो बच्चे के अन्दर छिपी सम्भावनाओं के प्रति बिलकुल उदासीन थे। और फिर ऐसे स्कूल थे जहाँ बच्चों को अधिक-सेअधिक अंक हासिल करने को हाँका जाता था, जो उनके लिए तथाकथित 'बेहतर जीवन' का पासपोर्ट माना जाता था। मैं भी ऐसे ही एक स्कूल से पास हुआ था। लेकिन वहाँ चन्ना की उपस्थिति ने फर्क पैदा किया था।

लिहाज़ा, मैंने वैली स्कूल छोड़ने का निर्णय लिया। मुझे लगा कि मैं जर्जर दीवारों और टूटे-फूटे फर्नीचर वाले स्कूलों में ज़्यादा उपयोगी रहूँगा; ऐसे स्कूल जहाँ शिक्षण साधन नहीं हैं, जहाँ गरीब परिवारों के बच्चे आते हैं और रट्टा मारकर सीखते हैं या ज़्यादा कुछ सीखते ही नहीं हैं, या वहाँ इसलिए आते हैं क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं है। मेरे सहकर्मियों ने कहा, “तो क्या? बच्चे तो हर जगह बच्चे होते हैं।” मैंने हामी भरी। लेकिन मेरा सवाल था: क्या हम इस गैर-बराबर और अन्यायी शिक्षा व्यवस्था के बारे में कुछ कर सकते हैं? क्या हम इसे अनदेखा करने का जोखिम उठा सकते हैं?

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