महाराष्ट्र के सरकारी अनुदान प्राप्त सेमी-इंग्लिश स्कूलों से क्या सीख सकते हैं?
Shaikshanik Sandarbh|November - December 2020
हाल ही में, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकार द्वारा दिए गए आर्दश कि सभी सरकारी स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम बनाया जाए, को खारिज कर दिया है। अभिभावकों की आकांक्षाओं के नाम पर हम कई बार कुछ ऐसे विकृत विकल्प चुनते हैं, इसलिए जागरूक सार्वजनिक बहस की बहुत ज़रूरत है।
अरविंद सरदाना

महाराष्ट्र में कई स्कूलों में सेमीइंग्लिश स्कूलों की परिपाटी रही है। यह चलन शायद तीन दशकों से चला आ रहा है। ये स्कूल थे तो मराठी माध्यम, परन्तु माध्यमिक शाला में विज्ञान और गणित के लिए अंग्रेज़ी पाठ्यपुस्तकों का उपयोग करना आरम्भ कर देते थे। शुरुआत में यह परिपाटी, शहरी व तालुका के कस्बाई स्कूलों द्वारा अपनाई गई। इन्हें सरकारी अनुदान प्राप्त था और ये स्थानीय ट्रस्ट द्वारा संचालित किए जाते थे। वर्ष 2005 में राज्य ने कुछ सरकारी स्कूलों को अर्ध-अंग्रेज़ी यानी सेमी-इंग्लिश नीति अपनाने की अनुमति दी। आज यह चलन सरकारी ग्रामीण स्कूलों द्वारा भी अपनाया जा रहा है, जिस कारण बच्चे इन्हीं स्कूलों में टिके हुए हैं। प्राइवेट स्कूल की तरफ पलायन कम हुआ है।

दो विरोधाभासी परिदृश्य

दो दशक पहले के महाराष्ट्र के एक दूर-दराज़ स्थित तालुका की कल्पना करें, जहाँ न तो अभिभावकों को अंग्रेज़ी की पृष्ठभूमि थी, न अँग्रेज़ी किताबों से कोई परिचय। यहाँ के परिवेश में अंग्रेज़ी पुस्तकें या अन्य छपी साम्रगी उपलब्ध नहीं थी। ऐसी स्थिति में सेमी-इंग्लिश माध्यम सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूल से क्या तात्पर्य? इन स्कूलों में विज्ञान और गणित की पाठ्यपुस्तकें अंग्रेजी में होती हैं और अन्य विषयों की पाठ्यपुस्तकें मराठी में। अंग्रेज़ी एक अलग विषय के रूप में भी पढ़ाया जाता है। इन बच्चों का प्राथमिक शिक्षण मराठी में होता, जो कि उनकी घरेलू या क्षेत्रिय भाषा थी। महत्वपूर्ण बात तो यह थी कि कक्षा में मराठी का उपयोग किया जाता था चाहे समझाना हो, सवाल पूछना हो या बातचीत करना हो। शिक्षक पाठ्यपुस्तक अंग्रेजी में पढ़ते थे पर समझाते मराठी में। एक द्वि-भाषी सांस्कृतिक प्रक्रिया सब दूर स्वीकारी जाती रही, हालाँकि शिक्षण पद्धति अधिकांश समय पारम्परिक रहती थी। जब बच्चे अंग्रेज़ी पाठ्यपुस्तकों को पढ़ने का प्रयास करते तो वे अंग्रेज़ी शब्दावली से परिचित हो पाते और उनका अर्थ मराठी में समझते व सोचते।

ऐसे स्कूलों के कुछ पूर्व-छात्रों (जो आज मेरे सहकर्मी हैं) से बात करके यह कह सकते हैं कि इन पाठ्यपुस्तकों को पढ़ना उनके लिए आसान नहीं था। वे न केवल कठिन शब्दों के अर्थों को लिखने और शब्दावली को याद करने से जूझा करते थे, उनमें प्रश्नों का जवाब अंग्रेज़ी में देने का खौफ बना रहता था। परन्तु, पाठ्यपुस्तकों से जूझना उनके लिए ज़रूरी था। शिक्षकों के प्रयास द्वारा वे धीरे-धीरे इस नई भाषा से परिचित होते चले गए। अंग्रेज़ी में लिखना एक बड़ी चुनौती थी और कई सहकर्मियों के लिए आज भी है। परन्तु, विज्ञान या गणित की परिचित पुस्तक को आत्मविश्वास से पढ़ने में तेजी-से बढ़ोतरी हुई है।

जैसे कि मेरे सहकर्मी बताते हैं कि तीन से चार वर्षों के दौरान वे आत्मविश्वास से इस सांस्कृतिक बाधा को पार कर पाए कि वे अंग्रेज़ी में उच्च शिक्षण ले पाएंगे या नहीं। इस दौरान वे सहपाठियों और शिक्षकों के साथ तकनीकी बातचीत मराठी में करने के परिवेश को संजोते रहे। जो अंग्रेज़ी उन्होंने सीखी, वह धाराप्रवाह तो नहीं थी परन्तु संसार का सामना करने का विश्वास बना। सबसे अहम बात यह रही कि वे मराठी को मूल भाषा के रूप में उपयोग करने की ताकत का फायदा लेते रहे। मराठी के लिए उनका आदर वास्तविक और गहरा है। और आज भी बना हुआ है। उन्होंने भाषाविदों द्वारा सुझाए वे तरीके साबित किए कि बच्चे भाषा आसानी से सीखते हैं, जब अर्थपूर्ण सन्दर्भ बन पाते हैं। घर या क्षेत्रिय भाषा में अर्थपूर्ण धाराप्रवाहिता से दूसरी भाषा को सीखने में मदद मिलती है। इस प्रक्रिया के साथ-साथ घर और क्षेत्रिय भाषा के लिए आदर बढ़ जाता है।

इंग्लिश भाषा सीखने में कहानी या कविता की किताबें प्रभावी भूमिका निभाती हैं। जरूरत होती है कि किताबें बच्चों की पहुँच में हों।

इस स्थिति की तुलना मध्य प्रदेश के एक शहर से करें। दो दशक पहले शहर में कुछ ही अंग्रेजी माध्यम स्कूल हुआ करते थे, और वे सभी प्राइवेट थे। कक्षा में हिन्दी में बोलने पर प्रतिबन्ध था। शिक्षक स्वभाविक रूप से हिन्दी में विषय-वस्तु को समझा नहीं सकते थे। बच्चों को भी कक्षा में हिन्दी में बोलने की छूट नहीं थी क्योंकि प्रशासकों और शिक्षकों का मानना था कि यदि हिन्दी में बोलेंगे तो वे अंग्रेजी बोलना नहीं सीखेंगे। वे कहते कि बच्चों पर अंग्रेज़ी में बोलने का दबाव डालना पड़ेगा। सभी पाठ्यपुस्तकें अंग्रेज़ी में हुआ करती थीं। हिन्दी एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता था। कई स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा भी अंग्रेजी में होती थी। कक्षा के बाहर, खेल के मैदान में या अध्यापक-कक्ष में बच्चे व शिक्षक, सभी हिन्दी में बोला करते थे परन्तु कक्षा में समझाने के लिए या पाठ्यपुस्तक पढ़ते समय या उसपर चर्चा करते वक्त शिक्षक हिन्दी का कम ही उपयोग करते। कक्षा में वार्तालाप की भाषा हिन्दी नहीं थी।

अक्सर, शिक्षकों की अंग्रेजी बोलने की क्षमता काफी सीमित थी। वे संक्षिप्त व्याख्या देकर अपना काम चलाते थे। कई बार हिन्दी उपयोग करने के लिए शिक्षक और विद्यार्थियों को प्रधानाध्यापक की डाँट भी सहनी पड़ती। कक्षा में हिन्दी का उपयोग होता, पर वह सीमित रहता और उसे अनुचित माना जाता। एक सहकर्मी याद करते हैं, कि जब वे एक ऐसे स्कूल के प्रधानाध्यापक थे, उन्हें 11वी-12वीं के कुछ वरिष्ठ शिक्षकों द्वारा चुनौती दी गई थी। शिक्षक हिन्दी का उपयोग खुलकर करते। उनके खयाल से हिन्दी में समझाना ही एक ऐसा तरीका है जिससे विद्यार्थी अवधारणाएँ समझ पाते और बोर्ड परीक्षा में पास हो पाते।

स्कूल में इस स्वाभाविक प्रवृत्ति को कई सालों तक दबाकर रखा जाता क्योंकि 'अंग्रेज़ी में ही बात करना है' की परिपाटी निभाना थी। इसके निहितार्थ गम्भीर हैं। शिक्षकों और विद्यार्थियों, दोनों के लिए पाठ में उत्तरों को 'कोष्ठक करना' एक सरल रास्ता था। अपने उत्तरदायित्व को पूरा कर पाते और बच्चे सही उत्तरों को याद शिक्षक कर लेते। ये बच्चे उच्च-मध्यम वर्ग के शहरी परिवारों के थे। उन्हें परिवार से या ट्यूशन का सहारा था। स्कूल के कार्यों से जूझकर खुद ही कुछ रास्ता निकाल लेते ताकि वे यथास्थिति से मुकाबला कर पाएँ। परन्तु, हिन्दी के लिए उनका सम्मान ज़रूर घट गया।

इस परिवेश में मध्य प्रदेश में अंग्रेज़ी एक आकांक्षापूर्ण भाषा के रूप में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे उच्च वर्ग के कुछ ही विद्यार्थियों तक सीमित रह गई है। हिन्दी में समझना और अर्थ लगाना, जोकि उनके लिए स्वाभाविक हो सकता था, उस पर प्रतिबन्ध-सा लग गया।

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