मेहनत रंग लाई
Champak - Hindi|October First 2021
9 वर्षीय आयशा अपने मम्मीपापा के साथ उत्तराखंड के सुदूर एक छोटे से पहाड़ी जिले में रहती थी. आयशा के पापा गांव की प्राथमिक पाठशाला में शिक्षक थे. गांव वाले प्यार से उन्हें मास्टरजी कह कर बुलाते थे. उन का गांव में बहुत सम्मान था.
डा.के. रानी

पाठशाला में आसपास के गांव के बच्चे भी पढ़ने आते थे. आयशा का गांव मुख्य सड़क से कुछ ही दूरी पर था. सरकार ने इस बार गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने का काम शुरू कर दिया था. स्थानीय ठेकेदार की देखरेख में कुछ नेपाली मूल के मजदूर सड़क निर्माण के लिए पहाड़ काटने का काम कर रहे थे.

वे इस जगह पहली बार आए थे. इसी वजह से वे यहां की भाषा नहीं समझते थे.

ठेकेदार उन्हें अपनी बात ठीक से नहीं समझा पाता, इसलिए वह उन्हें बेवजह डांटता रहता था. वे जब दुकान पर सामान लेने जाते तो दुकानदार भी उन की भाषा नहीं समझ पाता और अकसर वह उन्हें सामान देने से मना कर देता. यह देख कर मजदूर परेशान हो जाते.

मास्टरजी को अकसर वे आतेजाते देखते रहते थे. उन के पहनावे और हावभाव से वे समझ गए थे कि वे स्कूल के मास्टर हैं. वे सम्मानपूर्वक हाथ जोड़ कर उन को नमस्ते करते थे.

एक दिन मास्टरजी गांव की दुकान से सामान ले रहे थे, , तभी एक मजदूर वहां आया और उस ने दुकानदार से सामान मांगा. भाषा न समझ पाने के कारण दुकानदार ने हमेशा की तरह उसे झिड़क कर सामान देने से मना कर दिया. यह देख कर मास्टरजी को बड़ा दुख हुआ. उन्होंने तभी सोच लिया कि वे इन मजदूरों को थोड़ाबहुत स्थानीय भाषा जरूर सिखाएंगे. इस से इन्हें यहां रहने में कोई तकलीफ नहीं होगी.

मास्टरजी ने किसी तरह अपनी बात उन तक पहुंचा दी. दिन में काम के दौरान उन्हें बिलकुल भी समय नहीं मिलता था. शाम को मास्टरजी उन्हें वहीं थोड़ाबहुत हिंदी भाषा सिखाने लगे. कई बार उन्हें इस के लिए बहुत देर तक मजदूरों का इंतजार करना पड़ता था.

आयशा को यह बात जरा भी अच्छी नहीं लगी. अकसर शाम को वह अपने पापा के साथ पार्क में घूमने जाती थी. टहलते हुए पापा उसे बहुत अच्छी कहानियां सुनाते थे. मजदूरों को पढ़ाने के कारण इन दिनों पापा उसे बिलकुल भी समय नहीं दे पा रहे थे.

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