अपना ग्राउंड
Chakmak|August 2021
शहर की ठसाठस भरी गलियों, महल्लों और कांयकांय के बीच एक ग्राउंड था। अपना ग्राउंड। सबका ग्राउंड। ग्राउंड में गड्ढे थे। कई जगह पत्थर-कंकड़ भी। जहाँ ग्राउंड खतम होता, वहाँ कोने में कचरे का ढेर था। अब क्यूँकि कचरे का ट्रक हमारे महल्ले में नहीं आता था, वो ढेर पहाड़ का रूप ले चुका था। कई पुश्तों ने अपना कचरा यहाँ स्वाहा किया होगा।
लवलीन मिश्रा

कचरे के ढेर के पीछे समता नगर से झूमती-इतराती एक बोगनवेलिया की बेल दीवार को पार कर ग्राउंड में चली आई थी। उसमें गुलाबी और सफेद रंग के फूल खिलते थे। क्या नज़ारा था कचरा और फूल।

दो पेड़ थे। एक आम का और दूसरा इमली का। बड़े भैया लोग एकदम खिलाड़ी आदमी थे। एक पत्थर में दो-तीन आम लूट लेते। और लूटकर सब मिल-बाँटकर खाते।

बारिश में जब कीचड़ से भरे ग्राउंड में मेंढक टर्राते हमारी अड्डेबाज़ी बनी रहती। कोई फुटबॉल ले आता तो पूरे फीफा वाले जोश के साथ फुटबॉल खेलते। बारिश और गीले कीचड़ में नहाते हुए। धुंधली रौशनी में कोई किसी को पहचान नहीं पाता। बॉल दिख जाए वही काफी था। शायद यही एक मौका था जब हम एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते थे।।

मुद्दे की बात ये है कि ग्राउंड हमारा दूसरा घर था। वहीं दोस्त बने और कुछ अस्थायी दुश्मन भी (जो सही वक्त आने पे दोस्त बन जाते थे)। वहीं पे एक-दूसरे के राज़ साझा होते, षड्यंत्र रचे जाते, लड़कियाँ ताड़ते, जाली या फेक (जो परीक्षा के बाद पता चलता) क्वेश्चन पेपर मिलते, नए खेल सीखते, मम्मी-पापा और टीचरों की नकल उतारते, अपना दुखड़ा सुनतेसुनाते। कम शब्दों में कहूँ तो, हम वहीं पले-बढ़े।

ग्राउंड में मेरा पहला दोस्त फरीद था। उसने मुझे फुटबॉल से लड़ियाना सिखाया। कहता था, “बॉल से दोस्ती कर, डर मत।” एक बार जब मुझे खतरनाक वाला बुखार हुआ तो मैं हफ्तों ग्राउंड नहीं आ पाया। फरीद इतना परेशान हुआ कि जहाँ-तहाँ से पता करते-कराते मेरे घर पहुँच गया। उसे देख मेरा आधा बुखार गायब हो गया था। कितनी सफाई से बोला था, “नहीं आंटी, सोमेन बारिश में नहीं नहाया। वो हम सब को भीगने से मना भी किया।” माँ झट-से बोली, “अच्छा? भीगा तुम, बीमार सोमू हुआ!”

उस साल बहुत बारिश हुई थी। तीन बार स्कूल बन्द करने पड़े थे। फरीद ने बताया कि उसके पापा के गाँव में बाढ़ आई थी। फिर कुछ दिन बाद आकर बोला, “मेरी दादी मर गईं। घर के साथ बह गईं।” मैं सन्न रह गया। भला पानी का कहर ऐसा हो सकता है कि सोते हुए आदमी को घर समेत बहा ले जाए। हेमन्त ने अपनी स्टाइल से सांत्वना दी, “अच्छा है, गोरमेंट मुआवज़ा देगी। नया घर बनाकर देगी। पक्का घर।"

हर साल स्कूल की परीक्षा के बाद हम में से कई लड़के, दिवाली की छुट्टियों में अपने माँ-बाप के साथ गाँव निकल जाते थे। फरीद जैसों के गाँव बहुत दूर थे। आने-जाने में ही पाँच दिन लग जाते थे।

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