अस्पताल और कोरोना का डर
Chakmak|September 2021
मरीज़ों में कोई चुपचाप लेटा था तो किसी की नज़र ऑक्सीजन डिस्प्ले से हट ही नहीं रही थी। सपना मन ही मन सोचने लगी कि ऐसा माहौल तो जब से कोरोना शुरू हुआ है तब से सिर्फ टी.वी., रेडियो और अखबारों में सुनते और देखते आ रहे थे। अब कोरोना मरीज़ों को अपने सामने कुछ मीटर की दूरी पर बेड पर लेटे देख उसे डर-सा लगने लगा।
आरुषि

शुरू के दिनों में सपना को अस्पताल आने-जाने में डर लगता था। अब उसे इसकी आदत हो चली है। उसे अक्सर वो दिन याद आते हैं जब उसने अस्पताल में काम करना शुरू किया था। सपना को रूम नम्बर सोलह में जाना था। आगे बढ़ते हुए वह कमरा ढूँढ़ रही थी। उसकी नज़र अस्पताल की गहमागहमी पर भी थी। चारों तरफ रोते-चिल्लाते मरीज़ और उनके साथ परिवार के एक या दो रिश्तेदार नज़र आ रहे थे। उनके चेहरे पर उदासी साफ दिख रही थी। उनका ध्यान कमरे को ढूँढ़ने में था।

आखिरकार वह सोलह नम्बर के रूम में पहुँच ही गई। हाथों में झाडू-पोंछा पकड़कर सपना गेट खोल कमरे के अन्दर गई। कमरा तो उसके घर से भी बड़ा था। उस कमरे में पूरे पन्द्रह-सोलह बेड लगे थे और हरेक बेड पर एक मरीज़ लेटा था। बेड के बगल में ऑक्सीजन सिलेंडर भी रखा हुआ था। मरीज़ के चेहरे पर ऑक्सीजन का मास्क लगा था। मरीज़ों में कोई चुपचाप लेटा था तो किसी की नज़र ऑक्सीजन डिस्प्ले से हट ही नहीं रही थी। सपना मन ही मन सोचने लगी कि ऐसा माहौल तो जब से कोरोना शुरू हुआ है तब से सिर्फ टी.वी., रेडियो और अखबारों में सुनते और देखते आ रहे थे। अब कोरोना मरीज़ों को अपने सामने कुछ मीटर की दूरी पर बेड पर लेटे देख उसे डर-सा लगने लगा। उसने पूरी किट पहन रखी थी, तब भी। लोग तो कह रहे हैं कि कोरोना हवा से भी फैल रहा है। सच में कोरोना से बचे रहना कितना मुश्किल है। उसे ऐसा लग रहा था कि पूरा अस्पताल ही कोरोना मरीज़ों से भरा पड़ा है।

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