अपना धर्म छोड़ना
Chakmak|July 2020
मैं तब चालीस साल, पाँच महीने और सत्रह दिन का था। गर्मियों की एक शाम मैं पटना में था। पटना मेरे लिए बिलकुल नया शहर था। यहाँ मुझे कोई नहीं जानता था। इसलिए मैं जो करना चाह रहा था उसे करने के लिहाज़ से यह बिलकुल मुफीद जगह थी। दुकानों पर लगे बोर्ड पढ़ते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा था। और आखिरकार मुझे वो जगह मिल ही गई बाल कटाने का सैलून।
अजेन्दर सिंह

सैलून मेरे लिए वर्जित जगह थी। लेकिन चालीस सालों में आज पहली बार मैं बाल कटाने वहाँ पहुँच गया था। मेरे लम्बे बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी और फैली-सी मूंछे थीं। मैं सिख था सरदार जी। मेरा एक मन मुझे वहाँ से भागने के लिए कह रहा था। लेकिन दिमाग कह रहा था कि आज मैं यह किस्सा खतम कर ही दूं। परीक्षा की यह घड़ी कई दिनों से मुझे परेशान कर रही थी।

मेरी परवरिश सिख धर्म में हुई। बड़े होते समय मैंने अपने कई करीबी दोस्तों को 12 साल की उम्र से बाल कटवाते देखा था। हमारे लिए बाल कटाना वर्जित है। फिर भी मेरे अधिकांश युवा सिख दोस्तों ने यदि बाल कटाने का फैसला लिया तो कम उम्र में ही लिया। ऐसा उन्होंने करियर, खेल, बीमारी के चलते या फिर बिना किसी वजह के किया। मैं हमेशा सोचा करता था कि उनके मम्मी-पापा उन्हें ऐसा करने की इज़ाज़त कैसे दे सकते हैं। तब मुझे कभी भी ऐसा करने का लालच नहीं आया।

सिख धर्म मुझे विरासत में मिला था। मेरी माँ बहुत धार्मिक थीं। उन्होंने मुझे सारे धार्मिक ग्रन्थ सिखाए। उनकी इच्छानुसार मैं सब कुछ करता - लगभग हर हफ्ते गुरुद्वारा जाता, कीर्तन करता, सुबह की अरदास पढ़ता। मैं एक सच्चा सिख था। मैंने हमेशा दाढ़ी रखी, दस्तार (पगड़ी) पहनी जब मैं युवा था तब भी और बड़े होने पर भी।

मुझे याद है कि कई बार सड़कों पर “ओए सरदार तेरे बारह बज गए” या “जूडी” कहकर आवाज़ लगाई जाती। मुझे 1984 के दंगे भी याद हैं जब केवल पगड़ी वाले सिख होने के कारण हमारी जान पर बन आई थी। इन दंगों के कुछ महीनों बाद तक माँ लड़कियों की तरह मेरी पोनीटेल बनाया करतीं ताकि मैं एक सिख लड़का ना लगूं। तब मैं आठ साल का था। इन दंगों में मेरा घर भी जला दिया गया था। तब सालों तक मुझे अपनी माँ के साथ शरणार्थियों की तरह दरदर भटकना पड़ा था। अपने धर्म को मानने की हमें यह कीमत चुकानी पड़ी थी।

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