पराली प्रबंधन एवं गेहूं की बुआई में मशीनों की भूमिका
Modern Kheti - Hindi|1st November 2021
पराली प्रबंधन के मौजूदा विकल्पों को देखा जाए तो इसका यथास्थान प्रबंधन ही सबसे उपयुक्त विकल्प है जो कि पराली प्रबंधन के साथसाथ मृदा की उर्वरा शक्ति को बरकरार रखने या वृद्धि करने में सहायक है।
स्वप्नील चौधरी, भारत पटेल, गणेश उपाध्याय एवं अनिल कुमार

धान-गेहूं फसल चक्र में धान की कटाई तथा गेहूं की बुआई के मध्य बहुत ही कम समय होता है। इस समय सीमा में धान के अवशेष (पराली) का निपटारा करने हेतु किसानों के पास एक ही विकल्प बचता है कि वे उन्हें जला दें। इन अवशेषों को जलाने से स्थानीय तथा क्षेत्रीय स्तर पर भूमि तथा पानी गंभीर रूप से प्रदूषित होता है। इससे निकलने वाला धुआँ वातावरण में मौजूद विभिन्न गैसों के साथ मिलकर पर्यावरण को प्रदूषित करता है। विभिन्न शोधों से यह ज्ञात होता है कि यदि फसल अवशेषों का उचित प्रबंध कर उसे खाद के रूप में परिवर्तित कर दिया जाए तो जहाँ एक ओर इससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार होगा वहीं दूसरी ओर महंगे रासायनिक उर्वरकों के खर्च में भी कटौती होगी। साथ ही अवशेष के खाद के रूप में प्रयोग से पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी।

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में लगभग 75 प्रतिशत धान की कटाई कम्बाईन हार्वेस्टर से की जाती है जो धान के अवशेषों को खेत में बिखेरते हुए चलती है। इन बिखरे हुए अवशेषों से निजात पाने हेतु किसान उन्हें खेत में ही आग लगा देते हैं। अवशेषों को जलाने से पोषक तत्व के साथ-साथ मिट्टी की भौतिक स्थिति तथा पर्यावरण भी प्रभावित होता है जो कि एक अत्यंत गंभीर समस्या है। इन फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन हेतु खेत में (Insitu) तथा खेत के बाहर (Ex-situ) प्रबंधन जैसे दोनों ही विकल्प मौजूद है।

अवशेष के यथास्थान (खेत में) प्रबंधन से होने वाले लाभ की बात करें तो ऐसा करने से इनमें मौजूद पोषक तत्व मिट्टी मे मिल जाएंगे साथ ही साथ मिट्टी तथा पर्यावरण भी प्रदूषित होने से बचेगा। वहीं दूसरी ओर अवशेष के खेत से बाहर प्रबंधन की बात करें तो यह विकल्प भी अत्यंत लाभकारी है जिससे एक ओर तो खेत इन अवशेषों से मुक्त हो जाएगा तथा एकत्रित किए गए अवशेषों को परिवर्तित कर ब्रिकेट, बायोगैस या सीधा पवार प्लांट में ईंधन के रूप में किया जा सकता है।

पराली का यथास्थान (In-situ) प्रबंधन : पराली प्रबंधन के मौजूदा विकल्पों को देखा जाए तो इसका यथास्थान प्रबंधन ही सबसे उपयुक्त विकल्प है जो कि पराली प्रबंधन के साथ-साथ मृदा की उर्वरा शक्ति को बरकरार रखने या वृद्धि करने में सहायक है। वर्तमान समय में मौजूद कम्बाइन हार्वेस्टर से धान की कटाई के बाद निकलने वाली पराली की लम्बाई अधिक होने के कारण यह अन्य मशीनों के उपयोग में बाधा उत्पन्न करती है। यदि इस पराली को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर खेत में ही एक समान रूप से फैला दें तो दूसरी मशीनें आसानी से चलाई जा सकती हैं। इस कार्य हेतु अनेक मशीन बाजार में उपलब्ध हैं परंतु इनका उपयोग खेत में मौजूद पराली की मात्रा पर निर्भर करता है। यदि पराली की मात्रा बहुत ज्यादा नहीं है तो इन मशीनों का उपयोग आसानी से किया जा सकता है अन्यथा पराली का खेत के बाहर प्रबंधन (Ex-situ) का विकल्प अपनाना पड़ेगा।

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