उचित स्प्रे टैक्नॉलोजी की आवश्यकता
Modern Kheti - Hindi|15th September 2021
किसान फसलों के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए अधिक से अधिक स्प्रे कर रहे हैं। परन्तु कीट व रोगों पर फिर भी पूरी तरह से नियंत्रण नहीं हो रहा बल्कि स्प्रों की संख्या बढ़ने से उनकी लागतों में वृद्धि अवश्य हो रही है।
सुरेन्द्र कुमार, बी.टी.एम. आत्मा स्कीम

आधुनिक युग टैक्नॉलोजी एवं ज्ञान का युग है। इस युग में टैक्नॉलोजी के उचित प्रयोग के प्रति जानकारी होना बहुत आवश्यक है। कृषि को लाभकारी बनाने के लिए या फसलों को कीटों एवं रोगों से बचाने के लिए या फसलों के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए स्प्रे की अहम भूमिका है। परन्तु मौजूदा समय में अकसर किसान फसलों के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए अधिक से अधिक स्प्रे कर रहे हैं। परन्तु कीट व रोगों पर फिर भी पूरी तरह से नियंत्रण नहीं हो रहा बल्कि स्त्रों की संख्या बढ़ने से उनकी लागतों में वृद्धि अवश्य हो रही है।

कभी-कभी इन स्त्रों के प्रयोग के समय उचित जानकारी एवं उचित ढंगों का प्रयोग न होने के कारण दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं। दूसरा इन दवाओं का उचित समय एवं उचित ढंग से स्प्रे न होने के कारण इन रसायनों के अंश भी फसल उत्पादन में आने से, कृषि उत्पादन की गुणवत्ता में गिरावट आती है। मौजूदा समय में गुणवत्ता भरपूर उत्पादन के लिए स्प्रे का उचित ढंग से होना बहुत आवश्यक है।

अकसर यह देखने में आता है कि किसान सही पंप व नोज़लों का चुनाव किये बिना ही स्प्रे करते हैं। आज कृषि व्यवसाय में लागतें दिन प्रतिदिन बढ़ रही हैं। इन महंगी दवाओं/जहरों से सही लाभ प्राप्त के लिए स्प्रे नुक्तों के बारे में उचित तकनीकी जानकारी का होना बहुत आवश्यक है।

स्प्रे करने से पहले हमें यह पता होना चाहिए कि खेत में कौन सा कीट, खरपतवार या बीमारी है जिसके लिए यह स्प्रे किया जा रहा है और किस फसल पर यह स्प्रे किया जा रहा है। कितनी दवा व कितने पानी की मात्रा की सिफारिश की गई। हर बात की जानकारी होना बहुत आवश्यक है।

हर दवा के लेबल पर पूरी जानकारी दी गई होती है कि कौन से कीट/बीमारी के लिए यहा दवा है। दवा की कितनी मात्रा की आवश्यकता है और पानी की कितनी मात्रा का प्रयोग किया जाना है। यह सभी बातें लेबल पर दी जाती हैं। स्प्रे करते समय पानी की सही मात्रा का प्रयोग होना बहुत आवश्यक है। परन्तु यह देखने में आ रहा है कि किसान स्प्रे करने में सही तकनीकों व नुक्तों का प्रयोग नहीं करते। उनको सही नोज़लों के बारे में भी ज्ञान नहीं है।

अधिकतर किसान ठेके पर स्प्रे करवाते हैं। ठेके पर स्प्रे करने वाले मजदूरों को सही स्प्रे की कोई चिंता नहीं होती। उनका उद्देश्य सिर्फ कितने ढोल का प्रयोग होता है। वे जिन नोजलों का प्रयोग करते हैं उन नोजलों के मुंह खुले होते हैं ताकि पानी की मात्रा जल्दी व कम जोर लगने पर निकल जाए। वे स्प्रे करते समय स्प्रे लैअस को घुमाते रहते हैं और नोज़ल का मुंह निशाने की ओर न करके ऊपर की ओर करते हैं जिस कारण दवा सही दिशा पर कम ही पहुंचती है और दवा व्यर्थ हो जाती है जिससे दवा से पूरा लाभ प्राप्त नहीं होता बल्कि किसानों का आर्थिक नुक्सान अधिक होता है जिस कारण दिन प्रतिदिन कृषि लागतों में इजाफा हो रहा है और आमदनी घट रही है।

इस अंक में हम स्प्रे टैक्नॉलोजी व स्प्रे पंपों में इस्तेमाल की जाने वाली नोजलों इत्यादि के बारे में चर्चा कर रहे हैं ताकि किसान स्प्रे पंपों का प्रयोग करने के ढंग को गहराई से समझें और पर्यावरण को प्रदूषित किये बिना स्प्रे से अधिक से अधिक लाभ उठायें।

स्प्रे नोजलों का चुनावः स्प्रे करने के लिए सही नोजलों का चुनाव व उसका सही प्रयोग करना बहुत आवश्यक है। दवाओं को सही स्थान पर पहुंचाने का कार्य छिड़काव करने वाले यंत्र ही करते हैं। सही छिड़काव करने के लिए नोजलों की बहुत बड़ी अहमियत है। स्प्रे करते समय नोज़लों का सही चुनाव होना बहुत आवश्यक है।

नोज़ल स्प्रे मिश्रण को तुपकों में बदलने में सहायक होती हैं। स्प्रे का सफल होना नोज़लों पर निर्भर करता है। नोजलों के तीन भाग होते हैं। 1. शरीर 2. टोपी/कैप 3.सिरा (टिप)। टिप या सिरा नोजल का बहुत अहम भाग है।

नोजल के सभी भागों को बिना लीक हुए जोड़ना बहुत आवश्यक है। परन्तु कुछ नोज़लों में नोज़ल बॉडी के कैप और बॉडी में वाशर का होना बहुत आवश्यक है ताकि लीकेज से बचा जा सके।

स्प्रे मिश्रण के सही निशाने पर पहुंचना बहुत आवश्यक है। इसलिए नोजल का मूंह सही निशाने की ओर होना चाहिए ताकि स्प्रे मिश्रण सही जगह पर पहुंच सके। अक्सर देखने में आता है कि किसान धान पर स्प्रे करते हैं। नोज़लों का मुंह ऊपर की ओर होता है और स्प्रे पंप को हिलाते रहते हैं जिस कारण स्प्रे सही निशाने पर नहीं पहुंचता। इसलिए स्प्रे करते समय नोजलों का मूंह निशाने की ओर होना चाहिए जहां स्प्रे की आवश्यकता है। सही स्प्रे नोज़ल, पंप प्रैशर व नोजल से निकल रहे स्प्रे मिश्रण के कौण पर भी निर्भर करता है। जितना अधिक स्प्रे होगा उतना अधिक स्प्रे कौण होगा और स्प्रे सही होगा। स्प्रे मिश्रण सही रफतार से निशाने पर पड़ेगा। यदि प्रैशर कम होगा, स्प्रे भी कम कोन से और धीरे से निकलेगा, जिस कारण स्प्रे सही निशाने पर नहीं पहुंचेगा। यह बहुत आवश्यक है कि स्प्रे पंप में लगातार सही दबाव बना रहे ताकि स्प्रे सही निशाने पर पहुंच सके।

नोज़लों का चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि किस तरह के पैस्टीसाईडज़ व किस तरह की फसल या पत्तों पर इस्तेमाल किया जाना है। अधिकतर नोजलों में दो-तीन स्प्रे कोन होते हैं (65', 809, 110')

होलो-कोण नोजल: इस नोजल का सिरा या टिप पर कोर व डिस्क होती है। डिस्क पर एक गोल छेद होता है जो कि घुमाव प्लेट या कोर से जुड़ी होती है जो कोन नमूना स्प्रे पैटर्न पैदा करता है। इस कोन के केन्द्र में स्प्रे नहीं होता। इसलिए इसको होलो-कोन नोज़ल कहा जाता है। स्प्रे, कोन नोज़ल की कोर/घुमाव प्लेट व डिस्क पर निर्भर करता है।

स्त्रों के प्रयोग के समय उचित जानकारी एवं उचित ढंगों का प्रयोग न होने के कारण दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं। दूसरा इन दवाओं का उचित समय एवं उचित ढंग से स्प्रे न होने के कारण इन रसायनों के अंश भी फसल उत्पादन में आने से, कृषि उत्पादन की गुणवत्ता में गिरावट आती है। मौजूदा समय में गुणवत्ता भरपूर उत्पादन के लिए स्प्रे का उचित ढंग से होना बहुत आवश्यक है।

होलो कोन नोजल फलैट फैन जैट के मुकाबले उसी प्रैशर व फाईन क्वालिटी स्प्रे पैटर्न देती है। यह नोजलें अन्य नोज़लों के मुकाबले अधिक प्रैशर पर कार्य करती हैं। झाड़ीनुमा पौधे व चौड़े पत्तों वाली फसलों पर स्प्रे करने के लिए बढ़िया नोजल है जिन पौधों के सिरों पर स्प्रे करना हो वहां ये नोजले अच्छा प्रदर्षण दिखाती हैं। होलो कोन नोज़लें बाजार में कई तरह की आती हैं परन्तु लालच में किसान सस्ती व घटिया नोजल खरीद लेते हैं जिस कारण वे इन नोजलों से पूरा लाभ नहीं उठा सकते।

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