आलू कीट और रोग प्रबंधन
Modern Kheti - Hindi|15th September 2021
आलू सब्जियों की फसलों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। सब्जियों के अतिरिक्त आलू से निर्मित विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थ जैसे चिप्स, पापड़, नमकीन इत्यादि अत्यंत लोकप्रिय हैं।
डॉ.रुपेश शर्मा, ओपीजेस वि.,राज., डॉ. रेनू देवी

कृषि उत्पादन बढ़ाने में जो अनेक बाधाएँ है उनमें से एक प्रमुख बाधा फसलों में कीटों व रोगों का प्रकोप है। कीट जो फसलों के उत्पादन में क्षति के अलावा मनुष्यों एवं जनवरों में विभिन्न बीमारियाँ फैलाते हैं और साथ बीमारी फैलाने वाले नाशकों को बढ़ावा देते हैं। कीटों व रोगों के प्रकोप से फसलों के उत्पादन में बहुत बड़ी क्षति होती है। इस स्थिति से निपटने के लिए हमें दीर्घकालीन उपाय करने होंगे जिन के अन्तर्गत कीट की पहचान निरोधी उपाय यांत्रिक विधियाँ सरल क्रियाओं द्वारा कीटों का प्रबंधन सिचाई का उचित प्रबंध भिन्न-भिन्न फसलों पर कीटों व रोगों के प्रकोप का ज्ञान जैसे उपाय किया जाएँ। जिन्हें अपनाकर फसलों को कीटों से मुक्त रखते हुए हम उनसे अधिकतम उत्पादन ले सकते हैं। कीटों एवं रोगों के नियंत्रण हेतु अनेक उपाय एवं अनुसंधान किये गये हैं। बस जरूरत है किसान भाईयों तक पहुंचाने कि आलू में अनेक रोग व कीट हानि पहुंचाते हैं और कई तो अतीत में फसल के लिए अत्यंत घातक रहे हैं। आलू की फसल पर कीटों एवं रोगों की समस्या से निवारण के लिए समेकित कार्यक्रम आर्थिक दृष्टि से किसानों के लिए काफी उपयुक्त तथा सरल हैं। अत: इनके समेकित प्रबंधन हेतु क्रमश: उन्नत कृषिगत क्रियाएँ, यांत्रिक क्रियायें, जैव नियंत्रण क्रियाएँ एवं रासायनिक क्रियाएँ अपनानी चाहियें।

फसल पर प्रमुख कीट व उनकी रोकथाम माहूँ या चेपा (APHIDS): माईजस परसिकी व एफिस गॉसिपी नामक माहूँ आलू की फसल पर वैसे तो कीट पीड़कों की तरह नुकसान नहीं करते लेकिन यह रोग मुक्त बीज उत्पादन पर रोक लगाने में अहम भूमिका निभाते है। क्योंकि पति मोड़क व वाई वायरस के मुख्य वाहकों के रूप में कार्य करते है तथा इन वायरस रोगों से फसल को 40 से 85 प्रतिशत तक नुकसान होता है। फसल पर माहूँ के प्रबोधन से माहूँ द्वारा बीज फसल में बढ़ने वाले वायरस आयतन को कम किया जा सकता है। फसल या खेतों में मार के प्रभाव को आंकने के लिए उनकी गिनती पानी के पीले ट्रेप में या 100 यौगिक पतियों पर प्रति सप्ताह की जाती है।

नियंत्रण : पौधों पर वायरस रोगों का सीधा नियंत्रण न तो आसान है और न ही बहुत कारगर है।

1. हमारे देश के मैदानी इलाकों में ही लगभग 90 प्रतिशत बीज आलू की खेती की जाती है। यदि हम इन इलाकों में फसल बुवाई की तिथि से फसल काल को मांहूँ के आने से पहले पूरा होने के लिए समायोजित कर ले तो फसल को इस पर आने वाले मुख्य वायरस वाहनक माहूँ के प्रकोप से आसानी से बचाया जा सकता है। इसके लिए पश्चिमोत्तरी मैदानों में आलू की बोआई 25 अक्टूबर तक, मध्य भारत के मैदानों में 15 अक्टूबर तक, पूर्वतरी मैदानों में 5 नवम्बर तक पूरी कर ली जानी चाहिए।

2. मैदानों में यदि भूमि में पर्याप्त नमी है तो उस स्थिति में बुवाई के समय नालियों में फोरट 10जी की 15 से 20 किलोग्राम मात्रा का प्रति हैक्टेयर की दर से उपचार करके माहूँ जैसे रोग वाहकों को 45 दिनों तक फसल पर आने से रोका जा सकता है।

3. चेपा व हरा तेला की रोकथाम के लिए 300 मिली. डाइमेथोएट (रोगोर) 30 ईसी या आक्सीडिमेटान मिथाइल (मैटासिस्टाक्स) 25 ईसी को 200-300 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार दूसरा छिड़काव 10-12 दिन के अंतर पर करें।

कटुआ सफेद सुंडी/कटुआ कीट (CUT WORM) : कटुआ कीट के कारण आलू की फसल को 20 से 100 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है। महाराष्ट्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, कर्नाटक व हिमाचल प्रदेश कुछ विशिष्ट इलाकों में शुष्क काल में इसके कारण उपज में 60 प्रतिशत तक कमी देखी गई है। मैदानी इलाकों की अगेती आलू की फसल पर हमला काफी नुकसान करता है।

लक्षण : अगस्त-सितम्बर व अक्टूबर मध्य से दिसम्बर मध्य के दौरान कटुआ कीट का प्रकोप चरम सीमा पर होता है वयस्क व अर्भक (निम्फ) कटुआ कीट दोनों ही फसल की पत्तियों को काटकर भारी नुकसान पहुंचाते हैं। इसके प्रकोप के प्रारम्भिक लक्षण आलू की पत्तियों पर देखे जा सकते हैं। जिसके कारण पत्तियाँ नीचे की ओर मुड़ जाती हैं। प्रकोप के शुरू में पत्तियों का निचला भाग तौलिय दिखाई पड़ता है। धीरे-धीरे यह लक्षण सम्पूर्ण पौधे पर फैल जाते हैं। इससे ग्रसित पत्तियाँ छोटी रह जाती है जिनका निचला हिस्सा तांबे के रंग जैसे तथा चमड़ेनुमा सुखा हो जाता है।

नियंत्रण:

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