मौजूदा कृषि संकट से कैसे निकला जाए?
Modern Kheti - Hindi|1st September 2021
फसलों एवं सब्जियों के उत्पादन के लिए एवं फूलों व सब्जियों के बीज उत्पादन के लिए हमारे पास अनुकूल प्राकृतिक पर्यावरण है, हमें विकसित देशों की तरह फसल को ग्रीन हाऊस, पॉलीहाऊस एवं तुपका सिंचाई की सुविधा देने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस तरह हम खेती में प्रयास एवं लागतें कम करके अच्छी क्वालिटी की कृषि फसलों की पैदावार कर सकते हैं।
महिन्दर सिंह दोसांझ

हरियाणा व पंजाब में आये मौजूदा कृषि संकट एवं गिरावट के लिए अपनी लापरवाही के कारण किसी हद तक किसान भी जिम्मेदार हैं, परन्तु इस संकट एवं गिरावट की बुनियादें रखने का कार्य वास्तव में सरकारों ने ही किया है।

सन् 1950 के दशक से निकलते समय सरकारों ने विदेशों से अनाज मांगने के लिए अपने हाथ में पकड़ा ठूठा फैंक कर किसानों की पीठ पर थापी देकर भारत को अनाज के लिए स्वैः निर्भर करने के लिए प्रेरणा दी थी, इस उद्देश्य के लिए सरकारों ने किसानों को गेहूं की मैक्सीकन किस्मों के बीज लाकर दिये। सन् 1962 में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना की स्थापना के उपरांत वैज्ञानिकों ने धान एवं गेहूं की बेमिसाल उत्पादन देने वाली किस्में विकसित की और इन किस्मों की शानदार काश्त के लिए नई से नई विधियां एवं तकनीकें विकसित करके किसानों के खेतों तक नई खेती के बारे में ज्ञान का प्रकाश पहुंचाया।

फलस्वरुप 1960 के दशक तक कृषि वैज्ञानिकों की खोजें, किसानों की मेहनत एवं सरकारों की ओर से उत्पन्न संसाधनों के सहारे भारत सरकार ने देश के लिए अनाज की कमी पर नियंत्रण कर लिया। हरियाणा एवं विशेष तौर पर पंजाब राज्य ने अनाज के क्षेत्र में एक शानदार क्रांति को जन्म दिया, जिस कारण मंडियां अनाज से भर गईं, अनाज का यातायात करने के लिए गाड़ियों एवं रखने के लिए स्टोरों की कमी महसूस होने लगी, धीरे-धीरे देश ऐसी अवस्था की ओर बढ़ने लगा कि अनाज की खपत से उत्पादन अधिक तेजी से बढ़ने लगा और अनाज के भंडार भर गये जो सरकार के लिए परेशानियों का कारण बन गये हैं।

अपना वोट बैंक पका करने के लिए लड़ाई जीतने की व्यस्तता से समय निकाल कर सरकारों ने देश में कृषि एवं खाद्य के लिए भविष्य तक चलने वाली नीतियों के निर्माण के लिए कभी गंभीरता से विचार ही नहीं किया और न ही यह विचार किया कि अनाज की ओर से देश के स्वैः निर्भर होने के उपरांत अनाज के सरप्लस हो जाने की अवस्था से कैसे निपटना है? कृषि एवं खाद्य पदार्थ जैसे अति महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए 1960 से लेकर 1980 तक कम से कम बीस वर्षों के लिए नीति शास्त्रियों की ओर से नीति निर्माण के कार्य में कृषि एवं खाद्य पदार्थ की मौजूदा समस्याओं के समाधान के लिए व्यवस्था रखी जानी चाहिए।

उत्पादन बढ़ाने पर जोर : 1960 से लेकर अब तक हमारे कृषि वैज्ञानिकों, ब्रीडरों एवं किसानों को कृषि फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए ही संसाधन एवं प्रेरणा दी जाती है, इन फसलों में क्वालिटी को बढ़ाने के लिए न कोई विशेष प्रयास सरकारों की ओर से किये गये और न ही इसके लिए किसानों एवं ब्रीडरों को कोई उत्साह एवं प्रेरणा दी गई। इस कारण कृषि की हमारी अनेक फसलें जो अंतर्राष्ट्रीय मंडी में या विदेशों में भेजी गईं, वापिस आ गईं और अंतर्राष्ट्रीय मंडी में हमारे अक्स को कठिन आंच आई।

वास्तव में 1970 से जब तक हम अनाज में स्वैः निर्भर हो गये थे, हमें कृषि फसलों में क्वालिटी की स्थापना के लिए कृषि अनुसंधान को शीघ्रता से नई दिशा प्रदान करनी चाहिए थी, आश्चर्य तो इस बात का है कि 1947 से ही हम अंतर्राष्ट्रीय मंडी के साथ जुड़ने के लिए कार्रवाई में शामिल होते आये हैं, 1986 में भी हमने मंडी के साथ जुड़ने की पुष्टि के लिए आवश्यक दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किये थे और 1994 में हम पूर्ण तौर पर गैट संधि के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करके विश्व व्यापार संगठन के नियमों के साथ जुड़ गये, परन्तु अंतर्राष्ट्रीय मंडी के मानकों के अनुसार कृषि फसलों की क्वालिटी को ढालने के लिए अपने विश्वविद्यालयों में कार्य करते ब्रीडरों को ही आवश्यक संसाधन एवं प्रेरणा दी थी। किसानों को अपने देश की घरेलू जरुरत जितने अनाज उत्पादन के उपरांत हमें अंतर्राष्ट्रीय मंडी की मांगों एवं मानकों के अनुसार कृषि फसलों के उत्पादन के लिए गंभीरता से विचार-विमर्श करना चाहिए था, यदि ऐसी विचारधारा एवं प्रयास हम 1970 से ही करने शुरु कर देते तो आज किसानों एवं सरकारों की परेशानियों में वृद्धि न होती।

कृषि विभिन्नता क्यों नहीं कामयाब?:

मौजूदा समय में जो भी व्यक्ति देश में, विशेष तौर पर हरियाणा व पंजाब में यहां की भूमि, पानी एवं यहां के पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए किसानों को गेहूं-धान की फसल को कम करने के लिए सलाह देता है, किसान उसको एक ही प्रश्न से लाजवाब कर देता है किऔर कौन सी फसल बोएं? इस प्रश्न का उत्तर शायद सरकारों के पास भी नहीं है, क्योंकि किसानों ने अन्य फसलें आलू, गन्ना, मक्का, सूरजमुखी इत्यादि की भी बिजाई करके देखीं, परन्तु ये फसलें मंडी में उचित मूल्य पर नहीं बिक सकीं।

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