धान से अच्छी पैदावार के लिए रोग से बचाना जरूरी
Farm and Food|August Second 2021
भारत में धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. यह प्रमुख खाद्यान्न खरीफ फसल है. यह अधिक पानी वाली फसल है. हालांकि अब धान की कुछ ऐसी प्रजातियां और ऐसी तकनीकियां भी आ गई हैं, जिन में अधिक पानी की जरूरत नहीं होती.
डा. प्रेम शंकर, डा. एसएन सिंह, डा. राकेश शर्मा, डा. वीना सचान

धान की खेती भारत के कई राज्यों में होती है. हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में धान उगाया जाता है. वैसे, मक्का के बाद धान ही सब से ज्यादा पैदा होने वाला अनाज है.

धान की अच्छी पैदावार के लिए सब से पहले रोगों की पहचान कर उन से बचाव ही बेहतर उपाय है. रोगों का फैलाव तापमान और अन्य जलवायु संबंधी कारकों पर निर्भर करता है. साथ ही, सस्य क्रियाओं का भी असर पड़ता है. यही वजह है कि उपज में काफी कमी देखी जाती है.

धान किसान अच्छी पैदावार लेने के लिए रोग के लक्षणों को पहचानें, समझें और उचित उपाय कर होने वाले नुकसान को रोकें, तभी वे सुनिश्चित पैदावार ले सकेंगे और अपनी आमदनी में इजाफा कर सकेंगे.

प्रमुख रोग भूरी चित्ती या भूरा धब्बा

यह रोग हैल्मिन्थोस्पोरियम ओराइजी कवक द्वारा होता है. इस रोग के कारण पत्तियों पर गोलाकार भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. पौधों की बढ़वार कम होती है, दाने भी प्रभावित हो जाते हैं जिस से उन की अंकुरण क्षमता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है.

पत्तियों पर धब्बे आकार व माप में बहुत छोटे बिंदी से ले कर गोल आकार के होते हैं. पत्तियों पर ये काफी बिखरे रहते हैं. छोटा धब्बा गाढ़ा भूरा या बैगनी रंग का होता है. बड़े धब्बों के किनारे गहरे भूरे रंग के होते हैं और बीच का भाग पीलापन लिए गंदा सफेद या धूसर रंग का हो जाता है. धब्बे आपस में मिल कर बड़े हो जाते हैं और पत्तियों को सुखा देते हैं.

बचाव

• उर्वरकों विशेषकर नाइट्रोजन की संस्तुत मात्रा का ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि नाइट्रोजन की अधिक मात्रा देने से रोग का प्रकोप बढ़ता है.

• बीजों को थीरम और कार्बंडाजिम (2:1) की 3 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोना चाहिए.

• फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैंकोजेब 63 फीसदी (कार्बंडाजिम 12 फीसदी) की 750 ग्राम प्रति हेक्टेयर छिड़काव 10-12 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए.

खैरा

यह रोग मिट्टी में जस्ते की कमी के कारण होता है. इस में पत्तियों पर हलके पीले रंग के धब्बे बनते हैं, जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते हैं.

इस रोग के लक्षण पौधशाला में और रोपाई के 2-3 हफ्ते के अंदर छोटेछोटे टुकड़ों में दिखते है. रोगग्रस्त पौधा छोटा रह जाता है. निचली सतह पर कत्थई रंग के धब्बे बनते हैं, जो एकदूसरे से मिल कर पूरी पत्ती को सुखा देते हैं.

रोगग्रस्त पौधों की जड़ों की वृद्धि रुक जाती है. ऐसे पौधों में छोटीछोटी कमजोर बालियां निकलती हैं. उपज में कमी रोग की व्यापकता पर निर्भर करती है.

बचाव

• खेत में तैयारी के समय 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देना चाहिए.

• फसल पर 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और ढाई किलोग्राम बुझे चूने का 1,000 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

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