धान की खेती और फसल का रोगों व कीटों से बचाव
Farm and Food|May Second 2021
हमारे देश की खरीफ की प्रमुख खाद्यान्न फसल धान है. धान की खेती असिंचित व सिंचित दोनों परिस्थितियों में की जाती है. धान की फसल में विभिन्न कीटों का प्रकोप होता है. कीट एवं रोग प्रबंधन का कोई एक तरीका समस्या समाधान नहीं बन सकता, इसलिए रोग व कीट प्रबंधन के उपलब्ध सभी उपायों को समेकित ढंग से अपनाया जाना चाहिए.
डा. प्रेम शंकर, डा. एसएन सिंह, डा. राकेश शर्मा, वीना सचान

प्रमुख रोग झोंका (ब्लास्ट)

यह रोग पिरीकुलेरिया ओराइजी नामक कवक द्वारा होता है. इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों पर दिखाई देते हैं, परंतु इस का आक्रमण पर्णच्छंद, पुष्पक्रम, गांठों और दानों के छिलकों पर भी होता है. पत्तियों पर आंख की आकृति के छोटे, नीले धब्बे बनते हैं, जो बीच में राख के रंग के और किनारे पर गहरे भूरे रंग के होते हैं, जो बाद में बढ़ कर आपस में मिल जाते हैं. इस के फलस्वरूप पत्तियां झुलस कर सूख जाती हैं.

तनों की गांठें पूरी तरह से या उन का कुछ भाग काला पड़ जाता है. कल्लों की गांठों पर कवक के आक्रमण से भूरे धब्बे बनते हैं, जिन के गांठ के चारों ओर से घेर लेने से पौध टूट जाते हैं.

बालियों के निचले डंठल पर धूसर बादामी रंग के क्षतस्थल बनते हैं, जिसे 'ग्रीवा विगलन' कहते हैं. ऐसे डंठल बालियों के भार से टूट जाते हैं, क्योंकि निचला भाग ग्रीवा संक्रमण से कमजोर हो जाता है.

बचाव

• झोंका अवरोधी प्रजातियां जैसे नरेंद्र-118, नरेंद्र-97, पंत धान-6, पंत धान11, सरजू-52, वीएल धान-81 आदि रोग रोधी किस्मों का प्रयोग करें.

• इस रोग के नियंत्रण के लिए बोआई से पूर्व बीज को ट्राइसाइक्लैजोल 2 ग्राम या थीरम व कार्बंडाजिम (2:1) की 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें.

• रोग के लक्षण दिखाई देने पर 10-12 दिन के अंतराल पर या बाली निकलते समय 2 बार जरूरत के मुताबिक कार्बंडाजिम 50 प्रतिशत घुलनशील धूल की 1 किलोग्राम मात्रा को 700-800 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

• रोग का अधिक प्रकोप होने की दशा में ट्राइसाइक्लैजोल की 350 ग्राम मात्रा को 700-800 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें, साथ ही स्टीकर/सरफेक्टेंट 500 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर मिलाएं.

भूरी चित्ती या भूरा धब्बा

यह रोग हेल्मिन्थोस्पोरियम ओराइजी कवक द्वारा होता है. इस रोग के कारण पत्तियों पर गोलाकार भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. पौधों की बढ़वार कम होती है, दाने भी प्रभावित हो जाते हैं, जिस से उन की अंकुरण क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है.

पत्तियों पर धब्बे आकार व माप में बहुत छोटे बिंदी से ले कर गोल आकार के होते हैं. पत्तियों पर ये काफी बिखरे रहते हैं. छोटा धब्बा गाढ़ा भूरा या बैगनी रंग का होता है.

बड़े धब्बों के किनारे गहरे भूरे रंग के चक्ते होते हैं और बीच का भाग पीलापन लिए गंदा सफेद या धूसर रंग का हो जाता है. धब्बे आपस में मिल कर बड़े हो जाते हैं और पत्तियों को सुखा देते हैं.

बचाव

• उर्वरकों विशेषकर नाइट्रोजन की संस्तुत मात्रा का ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि नाइट्रोजन की अधिक मात्रा देने से रोग का प्रकोप बढ़ता है.

• बीजों को थीरम व कार्बंडाजिम (2:1) की 3 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोना चाहिए.

• फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देने पर मैंकोजेब 63 प्रतिशत (कार्बंडाजिम 12 प्रतिशत ) की 750 ग्राम प्रति हेक्टेयर छिड़काव 10-12 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए.

खैरा

यह रोग मिट्टी में जस्ते की कमी के कारण होता है. इस में पत्तियों पर हलके पीले रंग के धब्बे बनते हैं, जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते हैं. इस रोग के लक्षण पौधशाला में और रोपाई के 2-3 सप्ताह के अंदर छोटेछोटे टुकड़ों में दिखते हैं. रोग ग्रस्त पौधा छोटा रह जाता है. निचली सतह पर कत्थई रंग के धब्बे बनते हैं, जो एकदूसरे से मिल कर पूरी पत्ती को सुखा देते हैं.

रोगग्रस्त पौधों की जड़ों की वृद्धि रुक जाती है. ऐसे पौधों में छोटीछोटी कमजोर बालियां निकलती हैं. उपज में कमी रोग की व्यापकता पर निर्भर करती है.

बचाव

• खेत में तैयारी के समय 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देना चाहिए.

• फसल पर 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 2.5 किलोग्राम बुझे चूने का 1,000 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छड़काव करना चाहिए

• पौधशाला में जिंक के 2 छिड़काव बोआई के 10-20 दिन बाद करना चाहिए. बुझे चूने के स्थान पर 20 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग किया जा सकता है.

• पौधे की जड़ों को रोपाई से पहले 2 प्रतिशत जिंक औक्साइड घोल में 1 से 2 मिनट के लिए डुबोना चाहिए.

आभासी कंड या कंडुवा

यह रोग क्लेविसेप्स ओराइजीसैटावी नामक कवक द्वारा होता है. रोग के लक्षण पौधों में बालियों के निकलने के बाद ही स्पष्ट होते हैं. रोगग्रस्त दानों के अंदर कवक, अंडाशय को एक बड़े कूटरूप में बदल देता है, जो पहले पीले रंग का और बाद में जैतूनी हरा आकार में धान के दानों से दोगुना से भी बड़ा हो जाता है. इस पर बहुत अधिक संख्या में बीजाणु चूर्ण के रूप में होते हैं. उपज में हानि केवल रोगग्रस्त दानों से ही नहीं, बल्कि इस के ऊपरनीचे के स्पाईकिकाओं में दाने न पड़ने से भी होती है.

बचाव

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