हलदी खेती के फायदे अनेक
Farm and Food|April Second 2021
आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, सोहांव, बलिया के अध्यक्ष प्रो. रवि प्रकाश मौर्य ने हलदी की उपयोगिता और एक परिवार के लिए कम क्षेत्रफल में खेती करने की सलाह दी.
प्रो. रवि प्रकाश मौर्य, डा. सुमन प्रसाद मौर्य

उपयोगिता

हलदी का उपयोग प्राचीन काल से विभिन्न रूपों में किया जाता रहा है, क्योंकि इस में रंग, महक व औषधीय गुण पाए जाते हैं. हलदी में जैव संरक्षण और जैव विनाश दोनों ही गुण विद्यमान हैं. भोजन में सुगंध व रंग लाने में, अचार आदि भोज्य पदार्थों में इस का उपयोग करते हैं.

हलदी भूख बढ़ाने और उत्तम पाचक में सहायक होती है. यह रंगाई के काम में भी उपयोग होती है. दवाओं में भी इस का उपयोग किया जाता है. साथ ही, कौस्मैटिक चीजें बनाने में भी इस का उपयोग किया जाता है.

एक परिवार के लिए जरूरत

एक सामान्य परिवार को प्रतिदिन 15-20 ग्राम हलदी की जरूरत रहती है. इस तरह से महीने में 600 ग्राम, साल में 7 किलोग्राम सूखी हलदी की जरूरत होती है.

मिलावटी हलदी की पहचान

बाजार में ज्यादातर मिलावटी हलदी आ रही है, जिस में पीला रंग मिला रहता है. यदि हलदी का दाग कपड़े पर लगता है, तो साबुन से धोने से उस का रंग लाल हो जाता है और धूप में डालने पर दाग हट जाता है. अगर मिलावट है, तो दाग बना रहता है.

हलदी में मिलावट से बचने के लिए कम क्षेत्रफल एक बिस्वा/कट्ठा ( 125 वर्गमीटर) में हलदी की खेती की तकनीकी जानकारी दी जा रही है:

मिट्टी

हलदी की खेती करने के लिए दोमट मिट्टी, जिस में जीवांश की मात्रा अधिक हो, अति उत्तम है.

मुख्य प्रजातियां, अवधि और उत्पादकता

राजेंद्र सोनिया, सुवर्णा, सुगंधा, नरेंद्र हलदी-1, 2, 3, 98 व नरेंद्र सरयू मुख्य किस्में हैं, जो 200 से 270 दिन में पक कर तैयार होती हैं. उत्पादन क्षमता 250 से 300 किलोग्राम प्रति बिस्वा और सूखने पर 25 फीसदी हलदी मिलती है.

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