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कुप्रथा की बेड़ियां और सम्मान का संघर्ष
Jansatta Lucknow
|November 29, 2025
देश में महिला सशक्तीकरण के प्रयासों के बीच समाज में कुछ कुप्रथाएं और संकीर्ण मानसिकता आज भी मौजूद हैं, जो लड़कियों और महिलाओं को शिक्षित एवं आत्मनिर्भर बनने से वंचित कर देती हैं। शिक्षा, साहस, सहयोग और सामूहिक प्रयासों से ही इन जंजीरों को तोड़ा जा सकता है।
देश में एक ओर नारी शक्ति वंदन अधिनियम और 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान के जरिए महिला सशक्तीकरण की दिशा में कदम आगे बढ़ाए जा रहे हैं, दूसरी तरफ समाज में कुछ प्रथाएं और संकीर्ण मानसिकता आज भी मौजूद हैं, जो लड़कियों को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनने से वंचित कर देती हैं।
हाल में राजस्थान के भरतपुर जिले में एक लड़की की मर्मस्पर्शी कहानी सामने आई। वह रोज सुबह स्कूल के दरवाजे तक जाती और वहीं से लौट आती थी। एक दिन वजह पूछने पर उसने बताया कि मां का कहना है कि पढ़ाई बेटियों के लिए नहीं होती है। उसके घर में पीढ़ियों से यह तय है कि लड़कियां पढ़ें नहीं, बल्कि घर चलाने में मदद करें। बाहर से देखने पर यह मदद नाच-गाने की लगती है, पर असल में यह एक खास सामाजिक वर्ग में प्रचलित 'बेड़िया प्रथा' है। यह एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है, जहां बेटियों की जिंदगी परिवार की परंपरा के बोझ तले कुचल जाती है।
झालावाड़ जिले की एक अन्य लड़की की भी इसी तरह की दास्तान सामने आई थी। वह तेरह वर्ष की थी, जब उसे कला सिखाने के बहाने नाच-गाने के कार्यक्रमों में भेजा जाने लगा। धीरे-धीरे उसे समझ आया कि यह कोई कला नहीं, बल्कि मजबूरी की जंजीर है। वर्ष 2018 में एक गैर सरकारी संगठन की मदद से उसे आवासीय विद्यालय में दाखिला मिला।
दरअसल, जिस वर्ग में यह बेड़िया प्रथा प्रचलित है, उसके बारे में माना जाता है कि यह मूलतः घुमंतू या अर्ध-घुमंतू समुदाय है। इसकी मध्य भारत (मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश), राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों में उपस्थिति रही है। बेड़िया समुदाय का इतिहास लोकनृत्य और गायन से जुड़ा रहा है। यह समुदाय पहले मेलों, राजदरबारों और सामाजिक कार्यक्रमों में नाच-गाने का काम करता था, लेकिन सामाजिक ढांचा बदलने लगा और आर्थिक अवसर सीमित हुए, तब यह पेशा गरीबी का माध्यम बन गया। अशिक्षा और सामाजिक तिरस्कार ने इस समुदाय को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया कि उनके नाच-गाने के पेशे पर शोषण और देह व्यापार की काली छाया पड़ गई। अब यह कुप्रथा पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली परंपरा के रूप में स्थापित हो चुकी है, जहां बेटियां अपने परिवारों की आर्थिक जिम्मेदारी ढोने के लिए शोषण का शिकार हो जाती हैं।
This story is from the November 29, 2025 edition of Jansatta Lucknow.
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