वर्चुअल दुनिया सिकोड़ने लगी रिश्तों का दायरा
Grehlakshmi|September 2020
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वर्चुअल दुनिया सिकोड़ने लगी रिश्तों का दायरा
तकनीकी साधन-संसाधन हमेशा से मनुष्य की उन्नति का परिचायक रहे हैं। विकास के साथ आगे कदम बढ़ाता मनुष्य रोज नई खोज करता है, नये गैजेट्स ढूंढता है। लेकिन जब यही साधन हमारे रोजमर्रा के जीवन और रिश्तों पर बुरा असर डालने लगते हैं तो सवाल मन में कुलबुलाते हैं कि इनका होना फायदेमंद है या हानिकारक?
सोनल शर्मा

लॉकडाउन की वजह से पिछले कुछ महीनों से थम-सी गई जिंदगी ने अब धीरे-धीरे अनलॉक होने की प्रक्रिया को अपनाना शुरू किया है। हालांकि अभी भी सारे संस्थान और प्रतिष्ठान खुले नहीं हैं। कई लोग अब भी वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं। बच्चे और युवा भी स्कूल बंद होने के कारण अभी घरों पर रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। कहीं ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है तो कहीं परीक्षाएं ऑनलाइन हैं। इन सबके बीच महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है इंटरनेट और मोबाइल, टैबलेट तथा लैपटॉप जैसे साधन । इसी बीच कई सारे ऑनलाइन प्लेटफॉर्स ने वेब सीरीज़ से लेकर गेम्स तक नई चीजें लांच कर डाली और लोग बड़ी संख्या में इनमें मशगूल होने लगे, बिना ये सोचे समझे कि इससे उनके रोजमर्रा के जीवन और रिश्तों पर क्या असर पड़ सकता है।

एक मल्टीनेशनल में काम करने वाले प्रिया और अभिषेक को लॉकडाउन शुरू होते ही घर से काम करने के लिए कहा गया। मैं बहुत खुश हो गई। क्योंकि मल्टीनेशनल कम्पनी में साथ जॉब करते हुए भी महीनों हम बात तक नहीं कर पाते थे। दोनों प्रोजेक्ट हेड हैं। इसलिए वीकेंड पर कभी मेरी मीटिंग होती तो कभी अभिषेक की। दफ्तर से घर आने के बाद इतनी थकान होती थी कि वीकेंड का एक दिन तो लगभग सोते हुए ही गुजरता था। बाकी बचा समय घर के सारे काम, ग्रॉसरी, शॉपिंग और किसी परिचित के यहां जाने में बीत जाता। जब लॉकडाउन में घर से काम करने का मौका मिला तो लगा कम से कम अब वीकेंड तो साथ गुजरेगा। लेकिन अभिषेक तो जैसे इसी समय के लिए उधार बैठे थे। उन्होंने सारे वीकेंड्स वेबसीरीज और मूवीज़ देखते हुए गुज़ार दिए। उन्होंने अपने मोबाइल फोन में कई ओटीटी प्लेटफॉर्म डाउनलोड करके रख लिए और जैसे ही काम से थोड़ा भी वक्त मिलता, वो मोबाइल से चिपक जाते। घर के काम में मदद करनी पड़ती तो चिड़चिड़ाने लगते या टालते रहते। मेरी तो डबल मुसीबत हो गई थी। साथ समय बिताना तो दूर की बात उल्टे हमने कई दिन बहस और झगड़ों में गंवा दिए। अब ऑफिस खुल चुके हैं और लगता है ठीक ही हुआ। कम से कम अब हमारे पास चिढ़ने और बहस करने के लिए वक्त नहीं है। और मोबाइल का यूज अब सिर्फ जरूरत के लिए ही होता है।'

असल में वर्चुअल सुविधाओं की दुनिया से घिरे हम कई बार ये भी भूल जाते हैं कि हम जीते-जागते इंसान हैं और हमें अपने जैसे ही इंसानों की जरूरत होती है न कि आभासी दुनिया के काल्पनिक लोगों की।

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