तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की बाढ़ से लड़ने की क्षमता
Bhugol aur Aap|July 2020
तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की बाढ़ से लड़ने की क्षमता
तटीय क्षेत्र कई मानव जनित चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जिनमें जल निकायों का अतिक्रमण भी शामिल है, जो उनकी बाढ़ से टालने की क्षमता को बाधित करता है। मुंबई, चेन्नई और कोच्चि के तटीय शहरों में हाल की बाढ़ इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। भले ही सरकार ने 1991 में तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड) अधिसूचना जारी की हो, लेकिन इसका क्रियान्वयन एक चुनौती है। कोच्चि में चार लक्जरी अपार्टमेंट परिसरों, जिनका निर्माण सीआरजेड अधिसूचनाओं का उल्लंघन था, को गिराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का हालिया आदेश एक अपवाद है।

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी कार्यदल (आईपीसीसी) के अनुसार, जलवायु प्रणाली की तापवृद्धि संदेह से परे है और 1950 के दशक के बाद से देखे गये कई परिवर्तन विगत दशकों और यहां तक की सदियों में अभूतपूर्व हैं। इस अवधि के दौरान, वायुमंडल और महासागर गर्म हो गए हैं, हिम और बर्फ की मात्रा कम हो गई है, समुद्री स्तर बढ़ गया है और ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता बढ़ गई है। जल जलवायु परिवर्तन का एक अभिन्न घटक है और वह प्राथमिक माध्यम है जिससे जलवायु परिवर्तन प्रभाव प्रकट होता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण, जल चक्र के महत्वपूर्ण बदलाव से गुजरने की उम्मीद है। यूनियन ऑफ कंसर्न साइंटिस्ट के मुताबिक गर्म जलवायु जमीन और महासागरों, दोनों स्रोतों से अधिक पानी का वाष्पीकरण का कारण बनता है; जिसके बदले में उष्ण वायुमंडल अधिक पानी धारण कर सकता है, तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री फॉरेनहाइट वृद्धि पर लगभग 4 प्रतिशत अधिक पानी धारण की क्षमता। इन परिवर्तनों से नकारात्मक प्रभाव देखे जा सकते हैं जैसे कि कुछ क्षेत्रों में वर्षा में वृद्धि और तीव्र अपवाह (बाढ़) वहीं कुछ क्षेत्रों में कम वर्षा और पानी की भारी कमी (सूखा)। इस प्रकार अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र और अधिक वर्षा का सामना कर सकते हैं तो शुष्क क्षेत्र और अधिक सूखा का सामना कर सकते हैं। यह पेयजल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, खाद्य उत्पादन, ऊर्जा उत्पादन, औद्योगिक निर्माण और पर्यावरणीय सतत्ता सहित अर्थव्यवस्था के लगभग सभी पहलुओं को प्रभावित करता है।

तट पर अधिकांश प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों जैसे कि मुहाना, बैकवाटर और मैंग्रोव का मानवजनित कारणों की वजह से अधिक क्षय हुआ और इनका अतिक्रमण भी हुआ है। इसलिए, जलवायु परिवर्तन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं को सहने की तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की क्षमता में व्यापक कमी आयी है। इसलिए भारत लगातार बाढ़ और समुद्र स्तर में वृद्धि का खतरे का सामना कर रहा है है। इस संदर्भ में, भारत के तटीय विनियामक जोन (सीआरजेड) अधिसूचनाओं का ध्येय, उनके उल्लंघनों और बाढ़ सहन की क्षमता के संभावित खतरों का पता लगाना महत्वपूर्ण है। यह आलेख केरल में बाढ़ की पृष्ठभूमि में सीआरजेड अधिसूचना के उल्लंघन के खिलाफ हाल ही में (मई 2019) सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बल देने के साथ उपर्युक्त मुद्दे की जांच करता है।

भारत का तटीय पारिस्थितिकी तंत्र

भारत के नौ राज्यों व चार केंद्र शासित प्रदेश में विस्तृत कुल 7517 किलोमीटर लंबी तटरेखा 75 जिलों को आवरित करता है (चित्र 1)।गुजरात और आंध्र प्रदेश में सबसे लंबी तटरेखा है, इसके बाद तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, ओडिशा, कर्नाटक, गोवा और पश्चिम बंगाल का स्थान आता है। भारत के पास 2.02 मिलियन वर्ग किमी का एक विशेष आर्थिक क्षेत्र (Exclusive EconomicZone: EEZ) है, जिसमें 0.86 मिलियन वर्ग किमी पश्चिमी तट पर, 0.56 मिलियन वर्ग किमी पूर्वी तट पर और 0.6 मिलियन वर्ग किमी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के आसपास है।

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