भारत में जाति व्यवस्था की प्राचीनता और निरंतरताः एक दलित परिप्रेक्ष्य
Bhugol aur Aap|July 2020
भारत में जाति व्यवस्था की प्राचीनता और निरंतरताः एक दलित परिप्रेक्ष्य
हजार वर्षों से अधिक समय से भारत में जाति व्यवस्था क्यों जारी है, यह एक ऐसा सवाल है जो बहुतों को चकित करता है। इसे समझने के लिए हमें अपने अतीत पर ध्यान देना होगा और जानना होगा कि पीढ़ी दर पीढ़ी इसे कैसे हस्तांतरित किया जाता रहा है। ज्यादातर लोग जो इससे इंकार करते हैं, वे व्याख्या करते हैं कि यह केवल विवाह में एक भूमिका निभाती है। तो क्या सजातीय विवाह जाति व्यवस्था के बनाये रखने के लिए एकमात्र सबसे बड़ा कारक नहीं है? इसलिए इस प्रणाली को जीवित रखने वाले कारकों पर फिर से प्रकाश डालने की जरूरत है और यह जानने की भी जरूरत है कि वे कौन से कारक हैं जो आज भी इसे पोषण प्रदान कर रहा है? जाति व्यवस्था की अभिव्यक्ति और इससे जुड़ी असमानता और हिंसा काफी व्यापक हैं।

जाति व्यवस्था, जिसे सुदूर अतीत में आरंभ किया गया, वह निश्चित रूप से एक अद्वितीय सामाजिक ढांचा है जो न केवल हजारों वर्षों से जीवित रहने में सफल रही है, बल्कि कई रूपों में आज भी जीवित है और कई रूपों में आज भी प्रत्यक्ष है। यह इस तथ्य की गवाही देता है कि श्रेणीबद्ध प्रकृति में निम्न और उच्च जैसी विभिन्न सामाजिक समूहों में विभक्त करने की ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था, चार्वाक, बौद्ध, जैन, इस्लाम व ईसाई जैसे विभिन्न प्रगतिशील और समतावादी हमलों से बची रही है। सच तो यह है कि जिन धर्मों ने हिंदुत्व के अतिव्यापी प्रभाव और इसकी जाति व्यवस्था को चुनौती दी थी, वे स्वयं ही दीर्घावधि में भारतीय उप-महाद्वीप में इसी तरह की औपचारिक और अनौपचारिक जाति व्यवस्था से प्रभावित हो गई।

स्थान, भाग्य और यहां तक कि अधिकार और कर्तव्य, जिन्हें समाज के विभिन्न समूह उपयोग करते हैं और अनुपालन करते हैं, को निर्धारित करने में सामाजिक स्तरीकरण की बड़ी भूमिका है। लोगों को श्रेणीबद्ध करने की पदानुक्रमित प्रणाली ऐसी कई स्थितियों का निर्माण करती है जिनमें निम्न श्रेणी के लोगों के समूह को शेष समाज से अलग होने के नाम पर एक या दूसरे बहाने पीड़ित किया जाता है। ऐसी पदानुक्रमित श्रेणीबद्धता के अवगुणों की ओर इशारा करते हुए जेराल्ड डी. बेरेमैन ने कहा है कि, 'भारतीय जाति व्यवस्था और अमेरिकी नस्ल/प्रजातीय संबंधों के पदानुक्रमों में सामाजिक समूहों और वर्गों की रैंकिंग को आमतौर पर सांस्कृतिक मामलों के रूप में स्वीकार की जाती है; जो भारी मूल्यों से लदी हुई, परंपरा द्वारा और यहां तक कि धर्म द्वारा समर्थित है। लेखक यहां तक कहता है कि इन पदानुक्रमों में विशेषाधिकार प्राप्त लोग, समाज में सामाजिक सामंजस्य के लिए इसे आवश्यक सामाजिक बंधन के रूप में मानते हैं। दूसरी ओर, वह कहते हैं कि इन समाजों के भीतर गतिकी का गहन विश्लेषण वस्तुतः सामाजिक सामंजस्य की कमी को दर्शाता है, और श्रेणीबद्धता सामाजिक घर्षण और संघर्ष पैदा करता है।

किसी भी समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने के लिए यह आवश्यक है कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्थाएं इस तरह से व्यवस्थित हों कि वे एक समतावादी समाज और देश बनाने की नींव बनें। लेकिन तथ्य यह है कि ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था पर आधारित समाज, सामाजिक और अन्य प्रकार की सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था, जो कि किसी भी समतावादी समाज के लिए आवश्यक शर्ते हैं, को रोकता है। जैक डोनली को लगता है कि यह विचार कि मानव होने के नाते कोई व्यक्ति समान सोच और सम्मान तथा एक अविच्छेद्य व्यक्तिगत अधिकार का हकदार है, वास्तव में पारंपरिक समाजों के लिए विदेशी अवधारणा है। वास्तव में, पारंपरिक समाजों में, भारत के साथ-साथ अन्य जगह, सामाजिक संरचनाएं और मानवीय गरिमा की अंतर्निहित सामाजिक दृष्टि, मानवाधिकारों पर नहीं, बल्कि सामाजिक कर्तव्यों और स्थिति पदानुक्रमों पर आधारित हैं।

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