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आशा और डर
आशा और डर
जीवन का जीना बहुत महँगा हो रहा है जबकि जिन्दगी सस्ती हो रही है। नीच प्रवृत्ति हमारे आधारभूत मूल्यों पर हावी हो रही हैं। मनुष्यता में पशुता जाग्रत हो रही है और शान्ति स्थापित करने के लिए देशों की नीति का साधन युद्ध बन गए हैं। लोगों और देशों पर आर्थिक स्तर के बजाय भावनात्मक स्तर का अधिक प्रभाव पड़ता है। सहमति के स्थान पर नियंत्रण और मतपत्र की जगह गोलियाँ चल रही हैं।
आचर्य रत्नानंद

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December 2019