रामायण साहित्यों में विज्ञान
Kendra Bharati - केन्द्र भारती|October 2020
रामायण साहित्यों में विज्ञान
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के साथ राम की पुरातन एवं सनातन ऐतिहासिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्थापना भी हो जाएगी।
प्रमोद भार्गव

अब विभिन्न रामायणों में दर्ज उस विज्ञान की वैज्ञानिकताओं को भी मान्यता देने की आवश्यकता है, जिन्हें वामपंथी पूर्वाग्रहों के चलते वैज्ञानिक एवं बुद्धिजीवी न केवल नकारते रहे हैं, बल्कि इनकी ऐतिहासिकता को भी कपोल-कल्पित कहकर उपहास उड़ाते रहे हैं। अतएव यह समय प्राचीन भारतीय विज्ञान के पुनरुत्थान का समय भी है।

क्योंकि रामायण और महाभारत कथाएं नाना लोक स्मृतियों और विविध आयामों में प्रचलित बनी रहकर वर्तमान हैं। इनका विस्तार भी सार्वभौमिक है। विश्व के वामपंथी विचारधारा से प्रेरित बुद्धिजीवियों का भी एक वर्ग तरह-तरह के कुतर्क गढ़ कर इस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत को मिथक कहकर नकारने की कोशिश करता रहा है। लेकिन देशदुनिया के जनमानस में राम-कृष्ण की जो मूर्त-अमूर्त छवि बनी हुई है, उसे गढ़े गए तर्कों-कुतर्कों से कभी खंडित नहीं किया जा सका। शायद इसीलिए भवभूति और कालिदास ने रामायण को इतिहास बताया। वाल्मीकि रामायण और उसके समकालीन ग्रंथों में 'इतिहास' को 'पुरावृत्त’ कहा गया है। गोया, कालिदास के रघुवंश' में विश्वामित्र राम को पुरावृत्त सुनाते हैं। मार्क्सवादी चिन्तक डॉ. रामविलास शर्मा ने रामायण को महाकाव्यात्मक इतिहास की श्रेणी में रखा है। जबकि इन ग्रंथों में विज्ञानसम्मत अनेक ऐसे सूत्र व स्रोत विद्यमान हैं, जिनके माध्यम से नए आविष्कार की दिशा में बढ़ा जा सकता है। हम इन्हें क्यों नहीं संकलित कर पाठ्यक्रमों में शामिल करते? ऐसा करने से मेधावी छात्रों में विज्ञान सम्मत महत्त्वाकांक्षा जगा सकते हैं और भारतीय जीवन-मूल्यों के इन आधार ग्रंथों से मिथकीय आध्यात्मिकता की धूल झाड़ने का काम भी कर सकते हैं।

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