ऐतिहासिक क्षण : श्रीराम मंदिर का भूमिपूजन
Kendra Bharati - केन्द्र भारती|September 2020
ऐतिहासिक क्षण : श्रीराम मंदिर का भूमिपूजन
५ अगस्त, २०२० इतिहास के पृष्ठों में स्वर्ण अक्षरों में लिखी जानेवाली संघर्ष, धैर्य, शान्ति, बलिदान की अद्भुत गाथा की पराकाष्ठा का वह स्वर्णिम दिन है जिसका भारतवर्ष तो क्या विश्व साक्षी बना| धन्य हैं वे लोग जिन्होंने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इसमें भाग लिया।
रेखा दवे

संघर्ष गत पांच शतक से तो चल ही रहा था परन्तु इस काल में अनगिनत लोगों ने बलिदान दिया। बहुत से ऐसे जो परलोक सिधार गए और उनमें से अनेक लोग हैं जिन्होंने इस कार्य सिद्धि का दर्शन किया। हिन्दू समाज के धैर्य का दर्शन भी इसके संघर्ष में निहित है। इस जाति ने शान्ति और धैर्य से इस आन्दोलन को चलाया। वास्तव में देखा जाए तो क्या श्रीराम को भारतवर्ष जो कि उनकी ही भूमि है, क्या आवश्यकता है कि यह न्यायालय सिद्ध करे कि यहीं उनका जन्म हुआ था! यह न्यायिक पद्धति से सिद्ध हो, इसके लिए भी यह समाज तैयार हो गया। जितना धैर्य हिन्दू जाति में है उतना विश्व की किसी अन्य जाति में कदाचित ही देखने को मिलेगा। यह जाति सहनशील भी है और अपने निश्चय में अटल भी क्योंकि सत्य का मार्ग अपनाया है एवं सत्य की विजय तो निश्चित है। ईश्वर के दरबार में देर है, अंधेर नहीं। सत्यमेव जयते श्रीराम जन्मभूमि कासंघर्ष इस बात को पुन: सिद्ध करता है।

भारत पर एक के बाद एक आक्रांताओं का प्रहार हुआ एवं उन दुष्प्रवृत्तियों ने इस सनातन संस्कृति को समूल नष्ट करने का प्रयास किया। पहले मुगलों ने और उपरान्त अंग्रेजों ने राज किया। इन दोनों ने भारत की आत्मा को चूंसा मुगलों ने हिन्दुओं की संस्कृति का नाश करने के लिए राम मन्दिर के साथ अनेक शताब्दियों से खड़े विशालकाय मन्दिरों के अतिरिक्त और भी अनेक दूसरे मन्दिरों को ध्वस्त किया, तक्षशिला, नालंदा, विशाल ग्रंथालयों को अग्नि में स्वाहा किया। ऐसा कहा जाता है कि इन ग्रंथालयों की अग्नि कई महीनों तक जल रही थी। यह इसका द्योतक है कि इन ग्रंथालयों में कितने बहुमूल्य [ग्रंथ होंगे! यही नहीं भारत की नारियों के साथ भी अत्याचार किया गया। ये सब किया गया जिससे कि वे हिन्दू धर्म को नष्ट करके भारत पर पूर्ण अधिकार जमा सकेंगे। ईसाइयों ने भी अपनी बुद्धि लगाकर भारतीयों को भ्रमित किया, उसमें भी बुद्धिजीवियों में बुद्धिभेद डालकर उनको अपनी संस्कृति से अलग करना प्रारम्भ किया। परन्तु यह समाज प्रतिकार में लड़ता रहा, जूझता रहा, झेलता रहा| आज इस संघर्ष का परिणाम जो अत्यन्त आनन्ददायी है, कुछ मात्रा में श्रीराम जन्मभूमि पूजन के रूप में हमारे समक्ष है।

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