जेएनयू की भयावहता

Kendra Bharati - केन्द्र भारती|February 2020

जेएनयू की भयावहता
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय या जएनयू का दृश्य किसी भी विवेकशील व्यक्ति को अंदर से हिला देने वाला है । विश्वविद्यालय परिसर में भारी संख्या में नकाबपोश लाठी डंडों, हॉकी स्टिक आदि लेकर छात्रों, पर हमला कर दें, छात्रावासों में . तोड़फोड़ करें, कुछ घंटों तक उनकी हिंसा जारी रहे और फिर आराम से भाग जाएं यह सब सामान्य कल्पना से परे है । जिस तरह के वीडियो दिख रहे हैं उनसे लगता ही नहीं है कि यह जेएनयू के स्तर का कोई विख्यात है ।
अवधेश कुमार

अब पुलिस सक्रिय है, प्राथमिकी भी दर्ज हो गई है । उम्मीद करनी दोषी निष्पक्ष होगी और चाहिए कि छानबीन पकड़े जाएंगे । हां, हम केवल उम्मीद ही कर सकते कर सकते हैं क्योंकि जिस तरह की राजनीति इस हिंसा को लेकर हो रही है उसमें पुलिस पर भी दबाव बढ़ता है । एक स्वर में हिंसा की निंदा हो तो पुलिस निर्भीक और निष्पक्ष होकर जांच करती है लेकिन अगर एक समूह दूसरे पर हिंसा का आरोप मढ़े और दूसरा पहले पर तथा राजनीतिक दल भी कूद जाएं तो फिर दोषियों और अपराधियों का पकड़ा जाना कठिन हो जाता है। जेएनयू में विचारधारा को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एवं वामपंथी संगठनों के बीच संघर्ष नया नहीं है। इस संघर्ष का अंत भी नहीं हो सकता। लेकिन वैचारिक संघर्ष विचारधारा तक ही सीमित होनी चाहिए थी। इसमें हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं। जैसे ही आप हिंसा करते हैं वैसे ही आप गुंडे और अपराधी हो जाते हैं। हिंसा करने वाले किसी भी विचारधारा के हो वे अपराधी ही माने जाएंगे। अगर तस्वीर यह बन जाए कि एक तरफ की हिंसा सही और दूसरे तरफ की गलत तो आप वैचारिक टकराव को हिंसक टकराव में बदलने से नहीं रोक सकते।

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