स्पन्दकारिका एवं स्पन्द की अवधारणा
Jyotish Sagar|September 2020
स्पन्दकारिका एवं स्पन्द की अवधारणा
भारतीय तन्त्र-दर्शन साहित्य-परम्परा
डॉ. योगेश शर्मा

विगत अंक में प्रतिपादन किया गया कि स्पन्द की प्रक्रिया 'उन्मेष' एवं 'निमेष' के प्रत्ययद्वय रूप से व्याख्यात है। स्पन्दन क्रिया के अन्तर्गत शक्तिचक्र के वैभव को उत्पन्न करने वाले भगवान् शिव के उन्मेष एवं निमेष से प्रलय एवं सृष्टि हुआ करते हैं, परन्तु ध्यातव्य है कि स्पन्दकारिका में 'सृष्टि' एवं 'प्रलय' के स्थान पर 'उन्मेष' एवं निमेष का प्रयोग किया गया है। सम्भवतः यह त्रिक की दार्शनिक पृष्ठभूमि का प्रभाव है, क्योंकि त्रिक दर्शन में सृष्टि तो किसी ऐसी वस्तु की हो सकती है, जिसका कभी कोई अस्तित्व न रहा हो, अर्थात् नवीन वस्तु का जन्म सृष्टि है, परन्तु त्रिक दर्शन के अनुसार शिव-शक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी नवीन वस्तु की सत्ता की कल्पना भी नहीं की जा सकती, अत: किसी भी पदार्थ की उत्पत्ति सम्भव नहीं है। इसी दृष्टि से स्पन्दकारिका में सृष्टि एवं प्रलय को उन्मेष एवं निमेष कहा गया। सृष्टि को 'सृष्टि' न कहकर 'उदय' कहा गया। किसी पूर्व विद्यमान किन्तु तिरोहित वस्तु का प्रकाश से पुनः आना ही उदय है। 'संहार' के स्थान पर प्रलय' शब्द का प्रयोग किया गया, क्योंकि संहार विनाश का सूचक है, परन्तु शिव एवं शक्ति का संहार सम्भव नहीं है, जिसके कारण उनसे अभिन्न जगत् का संहार भी कभी सम्भव नहीं है, अत: कारिकाकार के द्वारा प्रलय' शब्द का प्रयोग पूर्णत: सुविचारित एवं युक्तिसंगत है। प्रलय का नैर्वचनिक रूप 'प्रकृष्टेन लयः' भी इस बात को स्पष्ट करता है। प्रकृष्टेनलयः अर्थात् 'कार्य' का ‘कारण' में लय अर्थात् वस्तु का बीजात्मना अवस्थन 'संहार' तो नहीं है, किन्तु 'प्रलय' हो सकता है। 'प्रलय' संहार एवं विनाश नहीं है, अपितु अपने मूल में अवस्थान है।

'प्रलय' एवं 'उदय' के विषय में 'स्पन्दसन्दोह' में कहा गया है कि नीलादिक की बहिःरूपता जो 'उदय' है, वही अहन्तारूपता का प्रलय है और जो बहिःरूपता का प्रलय है, वही अहन्तारूपता का उदय है। अतः 'प्रलयोऽपि उदयरूपः उदयोऽपि प्रलयपरमार्थः भेदाभेद प्राधान्येतरता कृतस्तु अत्र विवेकः'। वस्तुतः चिदात्मा का प्रकाशन ही इसी प्रकार होता है। यहाँ अक्रम का प्रकाशन किया गया है।

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