श्राद्धकर्म गया में ही क्यों?
Jyotish Sagar|September 2020
श्राद्धकर्म गया में ही क्यों?
भगवान् रामचन्द्र रुद्रपद आकर जब पिंडदान करने के लिए उद्यत हुए, तब उनके पिता महाराज दशरथ स्वर्ग से हाथ फैलाए वहाँ आए। प्रभु ने उनके हाथ में पिंडदान नहीं देकर रुद्रपद पर ही उस पिंड को रखा, तब दशरथ जी ने कहा, 'पुत्र! तुमने मुझे तार दिया। रुद्रपद पर पिंडदान से मुझे रुद्रलोक की प्राप्ति हुई। ... तुम्हारे साथ अयोध्या के सब लोग, कीड़े-मकोड़े तक बैकुंठधाम जाएँगे।' ...
डॉ.हनुमान प्रसाद उत्तम

गया भारत का खास पितृतीर्थ है। ग पितृजनों की यह लालसा रहती है कि उनके वंश में कोई ऐसा पुत्र हो, जो गया जाकर उनका श्राद्धकर्म करें। गया में पिंडदान करने से पितरों की अक्षय तृप्ति मानी जाती है। पिंडदान के बाद वार्षिक श्राद्ध नहीं किया जाय, तो वार्षिक श्राद्ध नहीं करने का पाप नहीं होता, लेकिन यदि वार्षिक श्राद्ध किया जाय, तो वह उत्तम माना जाता है। उससे पितरों को बेहद खुशी मिलती है.

एक कोस (लगभग 3 किलोमीटर) क्षेत्र गया सिर कहलाता है तथा पाँच कोस (16 किलोमीटर) गया क्षेत्र है। इसी के अन्तर्गत समस्त तीर्थ आ जाते हैं। गया के इतिहास के बारे में ऐसी मान्यता है कि एक बार धर्म की पुत्री धर्मवती अपने पति महर्षि मरीचि के चरण दबा रही थी। उसी समय वहाँ ब्रह्माजी पहुँच गए। उन्हें अपना ससुर जानकर धर्मवती ने उठकर उनका स्वागत किया। महर्षि मरीचि को अपनी पत्नी का यह कार्य अनुचित जान पड़ा। उन्होंने पति सेवा त्याग के रूप में उसे अपराध मानकर पत्नी को शिला हो जाने का शाप दे दिया। तदुपरांत धर्मवती ने एक सहस्र वर्ष तक कठोर तपस्या की। तपस्या से खुश होकर भगवान् नारायण और सारे देवताओं ने धर्मवती को यह वर दिया कि उसके शिला रूप पर भी मौजूद रहेंगे।

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