तुलसी सठ की को सुनै, कलि कुचाल पर प्रीति

Jyotish Sagar|July 2020

तुलसी सठ की को सुनै, कलि कुचाल पर प्रीति
वर्ष में एक बार श्रावण शुक्ल सप्तमी के आस- पास किसी भी दिन अपनी सुविधा के अनुसार तुलसीदासजी की जयन्ती मनाने के नाम पर भगवान् श्रीराम के नाम और चरित का नगाड़ा बजा लेने वाले तुलसी भक्तों के ऐसे प्रबल पुरुषार्थ का ही एक प्रतिफल है कि तुलसी जयन्ती और रामनवमी इन दोनों समारोहों में होने वाले भाषण-प्रवचन हूबहू एक ही साँचे में ढले हुए प्रतीत होते हैं। यह तथ्य तुलसी जयन्ती में प्रतिवर्ष उजागर होते देखा-सुना जा सकता है।
विभा खरे

तुलसी के संबंध में एक बेहद चौंकाने वाला सत्य तथ्य यह भी है कि तुलसी के क्रांतिकारी चिंतन पर न तो किसी ने उनके जीते जी ध्यान दिया और न उनकी मृत्यु बाद आज तक भी भारतीय जनता उनकी सलाह पर कान देने का प्रयत्न कर पायी है। अपने मन की इस दारुण वेदना करते हुए गोस्वामी जी ने स्वयं अपना सिर पीट लेने जैसी शैली में कहा हुआ है :

रामायन अनु हरत सिव,

जगभ्यो भारत रीति।

तुलसी सठ की को सुनै,

कलि कुचाल पर प्रीति॥

'अरे, इस दुष्ट तुलसीदास की कथनी को सुनता कौन है?' ऐसी मनोव्यथा को चीख-चीखकर उजागर करने वाले तुलसीदास को अपनी प्रशंसा और जय-जयकार सुनकर भी क्या संतोष मिल पाता होगा भला।

वस्तुतः भारतीय जनमानस ने तुलसी को केवल इसलिए महिमामंडित करके अपनाया हुआ है कि दुर्भेद्य लौह आवरण में घिर-घुट कर बहती आ रही रामकथा को वहाँ से बाहर निकाल कर लोकभाषा के सरस-सरल मध्यम द्वारा जन-जन के लिए सुगम-सुबोध बना दिया। फलतः लौकिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए रामायण पाठ को मांत्रिक अनुष्ठान के रूप में प्रयुक्त करने वालों के हाथ एक आसान प्रक्रिया भी अनायास ही आ गयी, लेकिन इन 'मनोकामना सिद्धि' के प्रलोभन ने ही तुलसी के रामचरितमानस द्वारा प्राप्त होने वाले राष्ट्रीय सत्परामर्श से जन समाज को वंचित भी कर छोड़ा?

रामचरितमानस के आधार पर देश भर में प्रति वर्ष होने वाली असंख्य रामलीलाओं के आयोजकों, दर्शकों तथा रामायण पाठियों से जब यह पूछा गया 'श्री राम के कौन-से गुण को भारतीय जनता ने अपनाया है या अपनाने योग्य समझा है?' तो उत्तर एकदम शून्य ही रहा। रामकथा को आदर्श भाई, पिता, पुत्र, मित्र आदि का समुज्ज्वल स्रोत बताकर एक ही साँस में भारतीय आदर्शों की महिमा दोहरा जाने वाले कथावाचक भी इनमें से किसी एक आदर्श की प्रतिभूति बनकर प्रकट नहीं हो पाते। यही गोस्वामी जी के मनस्ताप का प्रत्यक्ष प्रमाण भी है।

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