भीमसेन एकादशी निर्जला एकादशी

Jyotish Sagar|June 2020

भीमसेन एकादशी निर्जला एकादशी
एकादशी के व्रत करने से वर्षभर की सभी एकदशियों के पुण्य का फल मिलता है
विभा खरे

भारतीय संस्कृति में एकादशी व्रत का महत्त्व पद्मपुराण में विस्तार से बताया गया है। भीम ने वेदव्यास से एवं गोपियों ने राधा जी से एकादशी व्रत के महत्त्व को पूछा था। गोपियों से पूछने पर राधा जी ने बताया कि मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष में भगवान् विष्णु के मुख से एक असुर का वध करने के लिए एकादशी की उत्पत्ति हुई, अतः वह तिथि अन्य सब तिथियों से श्रेष्ठ है।

एकादशी का पुण्य फल समस्त तीर्थों के बराबर

प्रत्येक मास में अलग-अलग एकादशियाँ होती हैं। एक वर्ष में कुल छब्बीस एकादशियाँ होती हैं। मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी से आरम्भ करके कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चौबीस एकादशी तिथियाँ एवं दो एकादशी तिथियाँ अधिकमास की होती हैं। एकादशी तिथियों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं : उत्पन्ना, मोक्षदा, सफला, पुत्रदा, षट्तिला, जया, विजया, आमलकी, पापमोचनी, कामदा, वरुथिनी, मोहिनी, अपरा, निर्जला, योगिनी, देवशयनी, कामिका, पवित्रा, पद्मा, इन्दिरा, पापांकुशा, रमा तथा प्रबोधिनी। अधिकमास की दोनों एकादशियों का नाम

सर्वसम्मत पुरुषोत्तम है। जो व्यक्ति एकादशी के छब्बीस नामों का पाठ करता है, वह भी वर्ष भर की द्वादशी (एकादशी) तिथियों के व्रत का फल प्राप्त कर लेता है। एक बार भीमसेन ने पितामह से कहा कि भ्राता युधिष्ठिर, माताकुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव भी एकादशी के दिन व्रत करते हैं और मुझ से एकादशी के दिन भोजन करने को मना करते हैं। मैंने उनसे कहा कि मैं एकादशी के दिन भक्तिपूर्वक भगवान् की पूजा कर सकता हूँ, दान-पुण्य कर सकता हूँ, परन्तु मैं भूखा नहीं रह सकता, क्योंकि मेरे पेट में अग्नि का वास है, जो अधिक अन्न खाने पर शान्त होती है। पितामह मैं केवल एक एकादशी का व्रत अवश्य कर सकता हूँ, सभी एकादशियों का नहीं। इस पर व्यास जी ने बताया कि तुम के शुक्लपक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत करने से वर्ष भर की सभी एकादशियों के पुण्य का फल मिलता है। इस एकादशी का पुण्य फल समस्त तीर्थों के बराबर है।

संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत

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