होलिकोत्सव की पौराणिकता

Jyotish Sagar|March 2020

होलिकोत्सव की पौराणिकता
होली का पर्व सौहार्द, सद्मिलन एवं समभाव का पर्व है, जो हजारों साल से भारत ही नहीं वरन् विश्व के अनेक देशों में सोल्लास मनाया जाता रहा है।
डॉ. श्याम मनोहर व्यास

फाल्गुन सुदी पूर्णिमा को होलिकोत्सव मनाया जाता है। इस पर्व को मनाने की पृष्ठभूमि में एक पौराणिक कथा निहित है। असुर राज हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान् विष्णु का बड़ा भक्त था। दिन-रात भगवान् विष्णु की स्तुति करता था। यह बात उसके पिता को पसन्द नहीं थी, क्योंकि वह विष्णु का विरोधी था। पिता ने पुत्र को समझाया, धमकाया कि वह विष्णु की भक्ति में ध्यान नहीं लगाए पर प्रहलाद अपनी विष्णु भक्ति पर अडिग रहा। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को कई प्रकार से यातनाएं दी पर वह अपने मार्ग से विचलित नहीं हुआ। अन्त में असुरराज हिरण्यकशिपु ने अपनी बहिन 'होलिका' को उसे मारने के लिए भेजा। बआ 'होलिका' भक्त प्रहलाद को लेकर आग की चिता में बैठ गई, पर भक्त प्रहलाद बच गए और होलिका अग्निसात हो गई, तभी से यह पर्व मनाया जा रहा है।

होलिकोत्सव रंग-रंगीला पर्व है। होली मनाने की परम्पर वैसे पूर्व वैदिक काल से ही अनवरत

रूप से चली आ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषक जन अन्न के दाने देवताओं को अर्पित कर होली का पर्व मनाते थे। आज भी होली की अग्नि में कई स्थानों पर गेहूँ की फसल की बालियाँ डाली जाती हैं। इसीलिए होली को 'नवसस्येष्टि' पर्व भी कहा गया है। इसका शाब्दिक अर्थ है नवीन अन्न के आगमन के स्वागतार्थ मनाया जाने वाला पर्व।

रंगों का यह त्योहार हमें संदेश देता है कि सात रंग हमारे जीवन को भी सतरंगी एवं आनन्दमयी बनाएँ। होली का दिन मित्रता एवं प्रेम भाव बढ़ाने वाला पर्व है। होली के दूसरे दिन सभी जन वैर भाव भुलाकर एक दूसरे पर रंग मलते हैं एवं आपस में गले मिलते हैं।

होली की प्राचीनता

प्राचीन वाङ्मय के अध्ययन से ज्ञात होता है कि यह पर्व पौराणिक काल से ही मनाया जाता रहा है। विष्णुपुराण में जहाँ भक्त प्रह्लाद की कथा का उल्लेख है, वहीं जैमिनि सूत्र के रचयिता ने अपने ग्रन्थ में होलिकोत्सव मनाने का वर्णन किया है। कामसूत्र के रचयिता महर्षि वात्सायन ने ‘होलाका' नाम से इस उत्सव का उल्लेख किया है।

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