शिवतत्त्व विवेचना
शिवतत्त्व विवेचना
भगवान् शिव अनादि, अनन्त एवं म अनश्वर देवता हैं, जिनकी आराधना प्राचीनकाल से ही विश्वव्यापी रही है । शिवोपासना भारतीय संस्कृति एवं आस्था का प्रमुख प्रेरणा स्रोत रही है । शिव शक्ति (ऊर्जा) का ही आदि रूप है ।
डॉ. श्याम मनोहर व्यास

भगवान शिव के आविर्भाव का वर्णन अनेक पुराण ग्रन्थों में मिलता है । किसी कल्प में स्वयंभू ज्योतिर्लिंग के रूप में, तो कभी दूसरे प्रकार से । सृष्टि के आदि में ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम मानसिक सृष्टि की जिससे चारों सनकादि कुमार प्रकट हुए । चतुरानन ब्रह्मा ने जब उनसे सृष्टि रचना को कहा, तो इन्होंने इंकार कर दिया और तपस्या में लीन हो गए । इस पर चतुरानन ने बड़ा रोष प्रकट किया । उन्होंने अपने क्रोध को संयत करना चाहा, फलतः उनके भूमध्य से वह रोष नील लोहित कुमार बन कर प्रकट हो गया । उत्पन्न होते ही वह रोने लगा । रोने के कारण इसका नाम' रुद्र' पड़ा ।

भगवान् श्रीकृष्ण ने भी गीता में ‘ रुद्राणां शंकरास्मि' कहा है । ईश्वर का नील लोहित रूप ही शंकर स्वरूप है । मन्यु, मनु, महिनस, महान्, शिव, उग्ररेता, ऋतध्वज, भव, काल, वामरेव और धृतव्रत ये एकादश शिव के रुद्र रूप हैं ।

भगवान शिव ने' कामदेव' को भस्म किया था । यह भी सत्य है कि कामवासना सृष्टि संचालन के लिए अनिवार्य है, पर उसका तामसिक रूप व्यभिचार, बहुगमिता, चरित्रहीनता एवं विकृत सेक्स में परिणाम होता है, तो उसका विनाश अथवा शमन भी आवश्यक है । शिव का ' कामदेव' को भस्म करने के पीछे यही उद्देश्य है । शिव का तीसरा नेत्र' कामदेव को भस्म करने के लिए ललाट के मध्य भाग में खुला था । इसीलिए शिव को त्रिलोचन भी कहते हैं । हर व्यक्ति के मस्तिष्क में तीसरा नेत्र छिपा पड़ा है, यदि इसका पाँच प्रतिशत भाग भी खुल जाए, अर्थात् जाग्रत हो जाए, तो व्यक्ति त्रिकालदर्शी ( भूत, भविष्य एवं वर्तमान का जानकार ) हो सकता है ।

तिब्बत में बौद्ध धर्मानुयायी लामा लोग शल्य एवं जड़ी बूटियों की सहायाता से' तीसरा नेत्र' जाग्रत करते थे । शिव के उनके गुणों एवं विशेषताओं के आधार पर नीलकंठ, त्रिलोचन, शशांक शेखर, अहिभूषण, रुद्र, आशुतोष, उमाप्रिय, गंगाधर, कर्पूरगौर, वृषभवाहन, मुण्डमालि, कृतिवास, भूतनाथ, श्मशान विहारीएवं असुरारि आदि पर्याय हैं ।

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February 2020