शास्त्र मात्र अपवाद हैं, रामकृष्ण उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति

Jyotish Sagar|February 2020

शास्त्र मात्र अपवाद हैं, रामकृष्ण उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति
उनका समग्र जीवन एक ऐसे शहर के पास व्यतीत हुआ, जो पाश्चात्य भावों से उन्मत्त हो रहा था, जो भारत के सभी शहरों की अपेक्षा विदेशी भावों से अधिक भरा हुआ था। वहाँ वे पुस्तकीय ज्ञान से हर प्रकार से अनभिज्ञ रहते थे, ये महाप्रतिभासम्पन्न व्यक्ति अपना नाम तक लिखना नहीं जानते थे, किन्तु हमारे विश्वविद्यालय के बड़े-बड़े प्रतिभावान् स्नातकों ने उनको एक महान् बौद्धिक प्रतिभा के रूप में स्वीकार किया।

माँ काली के परम भक्त ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के बचपन का नाम गदाधर था। इनका मूल निवास बंगाल राज्य के हुगली जिले में कामारपुकुर नामक ग्राम में था। इनका जन्म संवत् 1892 को फाल्गुन शुक्ल द्वितीया (18 फरवरी, 1836) के दिन एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। 7 वर्ष की अवस्था में ही इनके पिता का देहान्त हो गया था। जब ये 17 वर्ष के हुए, तो इनके बड़े भाई ने इन्हें कोलकाता बुला लिया। कोलकाता पहुँचने के कुछ दिनों पश्चात् ही इनके भाई के स्थान पर ये रानी रासमणि के दक्षिणेश्वर मंदिर में पूजा के लिए नियुक्त हुए। यहीं उन्होंने स्वयं को महाकाली के चरणों में समर्पित कर दिया। वे उनकी सेवा में इतना तत्पर रहते थे कि लोग उन्हें पागल समझने लगे। वे माँ काली का दर्शन करने के लिए व्याकुल रहने लगे। अपने भक्त की व्याकुलता को देखकर आखिर माँ काली ने भी उन्हें अपना साक्षात् करवा ही दिया। अब वे गदाधर से ठाकुर रामकृष्ण परमहंस बन गए।

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