राम-रसायन

Jyotish Sagar|February 2020

राम-रसायन
नारद जी से जब यह प्रश्न किया गया कि ना इस घोर कलियुग में मनुष्य के लिए दुःखों से विमुक्ति होने का कौन-सा उपाय है, तो नारद जी ने कहा 'हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नाम हि केवलम्।' अर्थात् केवल भगवान्नाम स्मरण ही मनुष्यों को दुःखों से मुक्ति प्रदान कर सकता है।
आचार्य एल.एन.व्यास

नारद जी से जब यह प्रश्न किया गया कि ना इस घोर कलियुग में मनुष्य के लिए दुःखों से विमुक्ति होने का कौन-सा उपाय है, तो नारद जी ने कहा 'हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नाम हि केवलम्।' अर्थात् केवल भगवान्नाम स्मरण ही मनुष्यों को दुःखों से मुक्ति प्रदान कर सकता है। तुलसीदास ने भी इन्हीं भावों की अभिव्यक्ति करते हुए कहा है :

कलियुग केवल नाम अधारा।

सुमरि सुमरि नगर उतरहिं पारा।।

गुरु नानक देव ने भी नारद और तुलसीदास के भावों का समोवश करते हुए कहा 'नानक नाम जहाज है, चढ़े को उतारे पार।' इस प्रकार सन्तों ने और अन्य सन्तों ने भी हरिनाम स्मरण को रेखांकित किया। महाकवि कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में 13वें सर्ग में प्रथम श्लोक में राम को राम नाम वाले हरि के रूप में निरूपित करते हुए कहा - 'रामाभिधानो हरिरित्युवाच।' अर्थात् राम नाम वाले हरि ने ऐसा कहा। व्युत्पत्ति के अनुसार देखा जाए, तो 'रमन्ते (रमन्ते) योगिनः इति रामः' जिनका ध्यान लगाकर योगी जन आनन्दित होते हैं वे राम हैं। राम का चरित शत कोटि विस्तार वाला है। उसका एक-एक अक्षर मनुष्यों के बड़े से बड़े पाप का उपशमन करने वाला है:

चरित रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम्।

एकैकमक्षरं पुंसां महापातक नाशनम्।।

भगवान् शंकर तो भगवती पार्वती से कहते हैं कि राम का नाम सहस्रों नामों के तुल्य अकेला फल देने वाला है। मैं स्वयं भी अहर्निश राम नाम स्मरण करता रहता हूँ। इस नाम के स्मरण मात्र से आनन्द ही आनन्द होता है।

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।

सहस्रनामतत्तुल्यं राम नाम वरानने।।

इस दो अक्षर के नाम की बहुत बड़ी महिमा है। यह एक अमूल्यनिधि है। यह एक ऐसी निधि है - खर्च नहीं कोई चोर न लेवे दिन दिन बढ़त सवायो। पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।। जो व्यक्ति इस राम नाम का स्मरण करता है, वह पापों से आवृत्त नहीं होता, उसके पाप विनष्ट हो जाते हैं। वह इस लोक में सांसारिक सर्वविध भोगों का (सांसारिक पुत्रादि सुखों का) उपभोग करके अन्त में परम पुरुषार्थ रूप मोक्ष पद को प्राप्त करता है:

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।

नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।।

इन दो अक्षरों वाले राम नाम की कार्यक्षमता अवर्णनीय है। विश्व विजय की क्षमता रखने वाले इस अनुपम राम मन्त्र का अनुष्ठान करने से व्यक्ति त्रिकालदर्शी सिद्ध पुरुष हो जाता है । जिस प्रकार साधारण व्यक्ति करतलस्थ बंदनी पाल को समग्र रूप से देख सकता है, उसी प्रकार राम नाम मन्त्र को सिद्ध किया हुआ व्यक्ति दिव्य दृष्टि से सम्पन्न होता है।

जगज्जैत्रैकमंत्रेण,

रामनाम्नाभिरक्षितम् ।

यः कण्ठे चारयेत् तस्य,

करस्थाः सर्वसिद्धिदयः । ।

जनसाधारण में यह उक्ति प्रचलित है - रामनाम की फेर माला। जप का दूत दे जाएगा टाला।। राम नाम की माला फेरने से अकाल मृत्यु को भी रोका जा सकता है। जप करने में माला का अपना महत्त्व है। माला सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड या दाने होते हैं। यदि गम्भीरता से विचार किया जाए, तो यह 108 संख्या कोई और नहीं है, ब्रह्माण्ड में स्थित नक्षत्र और उनके चरण हैं। प्रत्येक नक्षत्र में 4 चरण होते हैं और नक्षत्रों की संख्या 27 होती है। इस प्रकार 27x4=108 कुल नक्षत्र चरण होते हैं। यदि राशि के अनुसार विचार किया जाए, तो 12 राशियाँ होती हैं। प्रत्येक राशि 9-9 नवांशों में विभक्त होती है। इस प्रकार सम्पूर्ण राशि नवमांश की संख्या भी 12x9=108 है। इस प्रकार 108 की संख्या भूलोक में उपासना करने वाले उपासकों को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से भी जोड़ती है। अंकों की दृष्टि से भी अन्य व्यक्ति से मिलता है, तो राम-राम भी इससे जुड़ा हुआ है। कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से मिलता है, तो राम-राम कहता है। हम दुःख के समय भी राम-राम ही बोलते हैं। राम शब्द में र + आ + म इस प्रकार वर्ण संयोग है। वर्णमाला के अनुसार व्यंजनों में र 27वाँ वर्ण तथा म 25वाँ वर्ण है तथा स्वरों में आ 2 (दुसरा) स्वर है। इस प्रकार र + आ + म=27 + 2 + 25=54 हुआ। परिणामतः राम-राम 54 + 54=108 इस प्रकार राम राम योग 108 है। केवल राम-राम कहने मात्र से 108 मणियों की माला पूरी हो जाती है। है न यह राम राम का चमत्कार।

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