मनोकामना पूर्तिकारक रुद्राभिषेक
मनोकामना पूर्तिकारक रुद्राभिषेक
भगवान् शिव सभी मनोरथों को पूर्ण करने म वाले, पापों का क्षय करने वाले और पुरुषार्थ चतुष्ट्य की सिद्धि प्रदान करने वाले हैं। भगवान् शिव को जलाभिषेक अत्यधिक प्रिय है। यही कारण है कि दिन एवं रात्रि दोनों समय में उन्हें जल चढ़ाया जा सकता है।

रुद्राभिषेक में रुद्रपाठ अर्थात् शुक्ल यजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी के पाठ के साथ-साथ भगवान् शिव का अभिषेक किया जाता है। यह जलाभिषेक पाठ के दौरान निरन्तर किया जाता है।

शास्त्रों के अनुसार भगवान् शिव पर रुद्र पाठ के साथ किए गए रुद्राभिषेक से अनेक विकट समस्याओं का भी अन्त हो जाता है। विशेष रूप से देखें, तो मारक दशा के निवारण हेतु, किसी दुर्घटना योग से बचाव हेतु, वंशवृद्धि या पुत्र सन्तति की प्राप्ति हेतु, जन्मपत्रिका में स्थित कालसर्प योग, केमद्रुम योग, शकट योग या अन्य चन्द्रकृत अशुभ योगों के दुष्प्रभाव से बचाव हेतु, चन्द्रमा की अशुभ दशा से बचाव हेतु, कुष्ठ रोग, क्षय रोग, चर्म रोग अथवा अन्य किसी भीषण रोग के निवारण अथवा मुक्ति पाने हेतु, अनिद्रा, अशान्ति या अन्य किसी मानसिक चिन्ता अथवा रोग से मुक्ति प्राप्त करने हेतु, भाग्य में आ रहे अवरोधों को दूर करने हेतु, घर में भूत-प्रेत आदि उपद्रवों की शान्ति के लिए, नियमित रोजगार एवं अलक्ष्मी के निवारण हेतु, परकृत तन्त्र प्रयोग से बचाव हेतु, मृतवत्सा दोष के निवारण हेतु एवं भगवान् शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए भी यह जलाभिषेक उपयोगी हैं।

विविध मनोकामनाओं के अनुसार अभिषेक द्रव्य : सामान्य रूप से जल एवं दुग्ध से रुद्राभिषेक किया जाता है, लेकिन कतिपय विशिष्ट मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु विशिष्ट द्रव्यों का प्रयोग करने का भी विधान है। यहाँ इनका वर्णन अग्रपृष्ठ पर वर्णित तालिका में किया गया है ।

रुद्राभिषेक एवं पूजन की विधि : रुद्र पाठ मुख्य रूप से पाँच प्रकार का होता है : 1. रूपक या षडङ्गपाठ, 2. एकादशिनी रुद्री, 3. लघुरुद्र, 4. महारुद्र, 5. अतिरुद्र । इन सभी का सामान्य परिचय इस प्रकार है :

1. रूपक या षडङ्गपाठ : रुद्राष्टाध्यायी में 10 अध्याय हैं। प्रथमाध्याय से अष्टमाध्याय पर्यन्त भगवान् शिव की विशेष महिमा एवं उनके स्वरूप का 15 वर्णन किया गया है। नवम अध्याय में समस्त चराचर से शान्ति की प्रार्थना की गई है। इसलिए इसे शान्त्याध्याय के नाम से जाना जाता है और दशम अध्याय में 'स्वस्ति न इन्द्रो' इत्यादि बारह मन्त्रों से स्वस्ति वाचन किया गया है, इसलिए इसे स्वस्त्याध्याय के नाम से जाना गया है। प्रथम आठ अध्यायों में भगवान् शिव के विशेष वर्णन के कारण ही इसे 'रुद्राष्टाध्यायी' कहा गया है। इन दसों अध्यायों के एक आवृत्ति पाठ को 'षडङ्गपाठ' या 'रूपक पाठ' कहते हैं।

articleRead

You can read upto 3 premium stories before you subscribe to Magzter GOLD

Log-in, if you are already a subscriber

GoldLogo

Get unlimited access to thousands of curated premium stories and 5,000+ magazines

READ THE ENTIRE ISSUE

February 2020