भक्तचरित माहात्म्य और भक्तमाल

Jyotish Sagar|March 2020

भक्तचरित माहात्म्य और भक्तमाल
भक्त भक्ति भगवंत गुरु चतुर नाम बपु एक। इनके पद बंदन किएँ नासत बिघ्न अनेक।।

भक्त, भक्ति, भगवान् और गुरु चार नाम हैं, परन्तु शरीर एक है। इनके चरणों की वन्दना से अनेक प्रकार के विघ्नों का विनाश हो जाता है।

भक्तमाल की महिमा उक्त दोहे से भली- भाँति अभिव्यक्त होती है। भक्तचरित के श्रवण, पठन एवं गुणगान से तथा उनकी सेवा से मनुष्य का उद्धार हो जाता है। भक्तमाल के रचयिता नाभाजी स्वयं भी इसके साक्षात् प्रमाण हैं। प्रियादास जी लिखते हैं कि एक बार की बात है नाभादास जी के गुरु अग्रदास जी अपने आराध्य सीताराम जी की मानसी उपासना में लीन थे और उनके शिष्य नाभाजी धीरे-धीरे उनको पंखा झल रहे थे। उसी समय अग्रदास जी के एक शिष्य का जहाज समुद्री यात्रा में भँवर (समुद्री तूफान) में फँस गया। उस समय उस शिष्य ने गुरुवर अग्रदास जी का स्मरण किया। इसके परिणाम स्वरूप गुरु जी का ध्यान भी शिष्य की ओर गया और इससे उनकी मानसी उपासना में विघ्न हुआ। इस ध्यान-भंग की घटना को नाभाजी भी समझ गए और उन्होंने अपने पंखे की वायु के झोंके से जहाज को भंवर के संकट से पार कर दिया। ध्यान अवस्था में ही नाभाजी ने गुरुदेव को सूचित कर दिया कि अब वह जहाज पुनः चल पड़ा है, संकट टल गया है। यह सुनकर अग्रदेव जी ने आँखें खोली और चौंकते हुए कहा “कौन बोला?" नाभाजी ने हाथ जोड़कर कहा “वही आपका दास! जिसे आपने अपना प्रसाद दे-देकर पाला है।

नाभाजी के इस जवाब को सुनकर अग्रदासजी आश्चर्यचकित रह गए और वे मन ही मन सोचने लगे कि 'ओह! इसकी ऐसी ऊँची स्थिति हो गई कि यह मेरी मानसी सेवा तक पहुँच गया! आश्चर्य है कि इसने यहाँ बैठे ही बैठे दूर स्थित समुद्र में होने वाली घटना का प्रत्यक्ष कर लिया और यहीं से जहाज की रक्षा भी कर दी!' वे यह जान गए कि ‘सन्तों की सेवा तथा उनसे प्राप्त प्रसाद की ही यह महिमा है। इसी से इसे ऐसी दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई है।' तब अग्रदासजी ने नाभाजी को आज्ञा देते हुए कहा कि “तुम्हारे ऊपर साधुओं की कृपा हुई है, अब तुम उन्हीं साधु-सन्तों के गुण, स्वरूप और उनके हृदय के भावों का गान करो' (प्रियादासजी, भक्तिरसबोधिनी टीका, 10-11)। इसके बाद ही नाभाजी ने भक्तचरित पर आधारित 'भक्तमाल' की रचना की और उसे भवसागर से पार उतरने का एक मात्र उपाय बताया :

अग्रदेव आग्या दई भक्तन को जस गाउ।

भवसागर के तरन को नाहिन और उपाउ।।

नाभाजी कहते हैं कि भक्तों के गुण और चरित्र का वर्णन करने से इस संसार में कीर्ति और सभी प्रकार के कल्याणों की प्राप्ति होती है। तीनों तापों -आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक ताप का नाश होता है और भगवान् का निवास हृदय में स्थायी रूप से होता है :

जग कीरति मंगल उदै तीनौं ताप नसायै।

हरिजन को गुन बरनते हरि हृदि अटल बसाय।।

यदि भगवान् की प्राप्ति की आशा है, तो भक्तों के गुणों को गाना चाहिए। निःसन्देह भगवान् की प्राप्ति हो जाएगी। नाभाजी चेतावनी देते हुए लिखते हैं कि यदि ऐसा नहीं किया, तो जन्म-जन्मान्तरों में किए गए अनेक पुण्य भुने हुए बीज की तरह बेकार हो जाएंगे, क्योंकि भुने हुए बीज अंकुरित नहीं होते। उनसे कल्याण न होगा और न जन्म-जन्मान्तर में पछताना ही पड़ेगा :

हरि प्रापति की आस है तो हरिजन गुन गाव।

नतरु सुकृत भुंजे बीज ज्यौं जनम जनम पछिताव।।

जो व्यक्ति भक्तचरितों का संग्रह करता है, उनका कथन-श्रवण या अनुमोदन करता है, तो वह भगवान् को पुत्र के समान प्रिय है और उसे भगवान् अपनी गोद में बिठा लेते हैं :

भक्तदास संग्रह करै कथन श्रवण अनुमोद।

सो प्रभु प्यारौ पुत्र ज्यों बैठे हरि की गोद।।

स्वयं नाभाजी अपनी अभिलाषा बताते हुए कहते हैं “किसी को

बल का, किसी को योग का, किसी को यज्ञ का भरोसा है, तो किसी को

कुल का तथा किसी को अपने सत्कर्मों का भरोसा है, किन्तु मुझ

नारायणदास (नाभादास) की तो केवल यही अभिलाषा है कि भक्तों की

यह माला मेरे हृदय में बसी रहे।"

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