कोरोना और अर्थव्यवस्था पर घिरते मोदी और ट्रंप
Sarita|October Second 2020
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कोरोना और अर्थव्यवस्था पर घिरते मोदी और ट्रंप
एक तरफ 'विकास' और 'अच्छे दिन' का वादा कर के नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने, तो दूसरी तरफ 'अमेरिकन फर्स्ट और 'ग्रेट अमेरिका अगेन' कह कर डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने. सत्ता में पहुंचने के बाद दोनों की कथनी और करनी में जमीनआसमान का अंतर दिखा. एकदूसरे को दोस्त बताने वाले दोनों नेता न सिर्फ कोरोना को संभालने में नाकामयाब रहे, बल्कि दोनों के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था भी चौपट हो गई.
नसीम अंसारी कोचर

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी एकदूसरे के बैस्ट फ्रैंड होने का दावा करते हैं. दोनों को एकदूसरे का साथ पसंद आता है. दोनों एक सी सोच रखते हैं, एक सी बातें करते हैं. दोनों की ही नीतिअनीति, शोहरतबदनामी, कृत्यअकृत्य लगभग सामान हैं. दोनों की प्रवृत्ति एक सी है. और वैसे भी, एक इंसान अपनी जैसी ही प्रवृत्ति वाले इंसान से दोस्ती गांठता है. इसलिए, भले ही दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि एकदूसरे से बिलकुल भिन्न हो मगर यह दोस्ती कुछ असामान्य नहीं है.

मोदी और ट्रंप इमोशनल दोस्त से इतर राजनीतिक फ्रैंड यानी पौलिटिकल फ्रैंड ज्यादा हैं. उन की दोस्ती राजनीतिक लक्ष्यों को पाने के स्वार्थ में रचीबसी है. वे अपनेअपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए एकदूसरे से गलबहियां करते हैं और एकदूसरे के सिर आरोप मढ़ते भी हैं. वे एकदूसरे की तारीफ भी करते हैं और वक्त पड़े तो नीचा भी दिखा सकते हैं, जैसा कि ट्रंप के हालिया कृत्यों और आरोपों से सिद्ध भी होता है. ये ऐसे दोस्त हैं जो एकदूसरे को धमकाएं भी और प्यार भी करें. राजनीति की बिसात पर कबकब, कैसीकैसी चालें चलनी हैं, यह दोनों बखूबी जानते हैं.

याद होगा जब कोरोना से बचाव की दवा हाइड्रोक्लोरोक्वीन की बड़ी चर्चा हो रही थी. माना जा रहा था कि कोरोना वायरस के खात्मे के लिए यह दवा कारगर है. दुनियाभर में इस की बड़ी मांग हो रही थी. उस समय भारत द्वारा अमेरिका को सप्लाई भेजने में हुई देरी पर ट्रंप ने कैसे मोदी को धमकाया था. फिर जब मोदी सरकार ने दवा की खेप भेज दी तो कैसे ट्रंप लहरालहरा कर मोदी को अपना प्यारा दोस्त बताने लगे थे. यह ऐसी दोस्ती है जिसे राजनीति के लिए कभी लताड़ा जा सकता है तो कभी दुलारा जा सकता है.

नाकामी छिपाने की कोशिश

अमेरिका में फिलहाल राष्ट्रपति चुनाव की बेला है. ट्रंप का पद दांव पर है. वे अपने 4 वर्षों के प्रशासन की खामियां व कमियां छिपाने के लिए चीन और रूस सहित भारत सरकार व मोदी पर आरोपों की बौछार कर रहे हैं, बिलकुल वैसे ही जैसे मोदी अपनी नाकामियों को कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्रियों के मत्थे मढ़ते हैं. इस चुनाव में ट्रंप ने अपने करीबी प्रतिद्वंद्वी जो बाइडेन से बहस के दौरान भारत पर कोरोना संक्रमितों और कोरोना से हुई मौतों का आंकड़ा छिपाने का आरोप लगाया है, क्योंकि वे खुद अमेरिका में कोरोना के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगा पाने में असफल साबित हुए हैं. अपनी नाकामी पर परदा डालने के लिए ट्रंप अपने बैस्ट फ्रैंड को संकट में डालने से नहीं चूके.

मगर मोदी ने भी दोस्ती की लाज रखी और ट्रंप के आरोपों के जहर को नीलकंठ की तरह पी गए. ऐसे बैस्ट फ्रैंड जो अपने राजनीतिक लक्ष्यों को साधने के लिए दोस्त की इमेज की धज्जियां उड़ा दें, सिर्फ राजनीति के मैदान में ही पाए जाते हैं. गौरतलब है कि ट्रंप के आरोपों से भारत में मोदी सरकार की काफी किरकिरी हुई है. कोरोना के मामले में सरकार द्वारा बताई जा रही कोरोना संक्रमितों और मरने वालों की सही संख्या पर संशय पैदा हो गया है. विपक्षी दलों ने इस पर मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया है.

धर्म और राष्ट्रवाद भुनाने में माहिर

मोदी और ट्रंप एकदूसरे से काफी भिन्न पृष्ठभूमि वाले परिवारों से आते हैं. ट्रंप जहां अमेरिका में एक दिग्गज प्रोपर्टी कारोबारी के बेटे हैं, वहीं नरेंद्र मोदी गरीब परिवार से आते हैं जिन्होंने बचपन में चाय तक बेची है. यह अलग बात है कि राजनीति की बिसात पर दोनों शीर्ष नेताओं में कई समानताएं हैं. 74 साल के ट्रंप और 70 साल के मोदी की जबरदस्त लोकप्रियता है. राजनीतिक दलों के कैंपेन में इन के चेहरे मुख्य आकर्षण होते हैं. नस्लवादी, दक्षिणपंथी, छद्म राष्ट्रवाद के प्रचारक जैसे आरोप दोनों पर लगते रहे हैं. ट्रंप प्रशासन का फोकस जहां प्रवासियों को अमेरिका में आने से रोकना है, वहीं मोदी, संघ के इशारे पर, मुसलामानों के खिलाफ खड़े दिखते हैं.

ट्रंप ने कई देशों के नागरिकों के अमेरिका में घुसने पर रोक लगाई जिस का असर मुसलिम बहुल देशों पर खासतौर से पड़ा. वहीं, मोदी नागरिकता संशोधन कानून के जरिए मुसलिम प्रवासियों के साथ भेदभाव करना चाहते हैं. दोनों अपनेअपने देशों में राष्ट्रीयता को बढ़चढ़ कर बढ़ावा देते हैं. जहां ट्रंप ने 'अमेरिका फर्स्ट' के जरिए इस मुहिम को आगे बढ़ाया है, वहीं मोदी ने 'मेक इन इंडिया' के जरिए इस को प्रमोट किया है. दोनों को अपनेअपने देशों में दक्षिणपंथियों का जोरदार समर्थन मिला हुआ है. दोनों धर्म और राष्ट्रवाद जैसी भावुकता को भुनाना भलीभांति जानते हैं.

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