काले कृषि कानून किसानों के लिए मोक्ष के द्वार
Sarita|October Second 2020
काले कृषि कानून किसानों के लिए मोक्ष के द्वार
एक समय था जब काशी बनारस में पंडेपुजारियों की एक कोरियर सर्विस सीधे स्वर्ग से चलती थी, जिस में धर्मांध लोगों को सशरीर स्वर्ग भेजा जाता था. इतिहास के पन्नों में दर्ज जानकारी के अनुसार, काशी के पंडे भारी रकम ले कर बेवकूफ लोगों को पकड़ उन्हें बुर्ज पर चढ़ा देते थे. वहां कुछ मंत्र पढ़ कर यह कह कर उन्हें नीचे कुदा देते थे कि यहां मरने वाले सीधे स्वर्ग जाते हैं.
भारत भूषण, शैलेंद्र सिंह, मदन कोथुनियां, वेणीशंकर पटेल ब्रज

औरंगजेब के जमाने में इस की शिकायत मिलने पर जांच की गई तो पता चला कि दानदक्षिणा देने के बाद स्वर्गारोहण के लिए आतुर भक्त बुर्ज पर करवट ले कर नीचे जिस कुएं में दाखिल होता था, उस में तलवारों और खंजरों की चरखी लगी रहती थी, जो उस के टुकड़ेटुकड़े कर उसे गंगा की मछलियों का आहार बना देती थी. इस बीच जोरजोर से बजते ढोलताशे, झांझमंजीरों की तेज आवाज मरने वालों की चीखपुकार को उन के शोर में दबा देती थी.

यह लोमहर्षक लेकिन दिलचस्प वाकेआ आज भी मौजूं है. पिछले 6 वर्षों से सरकार चुनचुन कर आम लोगों को धरती पर ही स्वर्ग का सा एहसास करा रही है, जिस के ताजे शिकार बेचारे पीढ़ियों से नरक भोग रहे किसान हैं, जिन्हें संवैधानिक मोक्ष प्रदान करने के लिए मोदी सरकार 3 नए अध्यादेश ले आई है. ये कानून मगरमच्छों के लिए पौष्टिक आहार हैं और याद दिलाते हैं कि अन्न या कृषि उपज पर पहला हक उन ऋषिमुनियों का है जो दिनरात राजा के कल्याण, सिंहासन और सलामती के लिए यज्ञहवन वगैरह किया करते रहते थे.

अब यह और बात है कि कलियुग यानी धोखे से या खेलखेल में लागू हो गए लोकतंत्र में ये ऋषिमुनि कुटियों में नहीं, बल्कि बड़ेबड़े आलीशान महलों में रहते हुए सरकार के लिए आर्थिक अनुष्ठान कर रहे हैं.

किसान को उतना ही मिले जितने से उस का पेट भर व पल जाए. ज्यादा मिलेगा तो वह इधरउधर और अपने भले व हित की सोचने लगेगा. इसलिए, मौजूदा सरकार को बेहतर यही लगा कि अब वक्त है कि इन्हें स्वर्ग का झांसा दिया जाए और इस की व्यवस्था देशभर में एकसाथ कर दी जाए. कृषि संबंधी नए गैरजरूरी कानून, जिन की मांग कम से कम किसानों ने तो बिलकुल नहीं की थी, लागू कर दिए गए हैं.

कृषि उपज मंडी और एमएसपी का पिंडदान

अध्यादेश का पहला कानून ही किसानों के उत्पाद की खरीद को सूदखोर व्यापारियों के हवाले कर सही दाम मिलने की गारंटी को खत्म करने की बात कर रहा है. धर्म और पाखंड के भगवा रंग में रंगे ये पंडे चाहते हैं कि कृषि उपज मंडियों और न्यूनतम समर्थन मूल्य का पिंडदान जल्द हो जाए. इस का विरोध कर रहे किसानों की यह मांग जायज है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी को कानूनन अनिवार्य किया जाए. अब भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह यह कहते रहे कि एमएसपी को खत्म नहीं किया गया है, किसान उन का भरोसा करने वाले नहीं क्योंकि इस के बाबत सरकार गोलमोल मसौदा नए कानून में लाई है.

व्यापार एवं वाणिज्य (प्रोत्साहन) तथा सरलीकरण अध्यादेश 2020 किसानों को उपज की सीधी खरीद की पूरी छूट देता है. भगवा ब्रिगेड के पंडे बता रहे हैं कि इस का फायदा किसान को होगा. पंजाब, हरियाणा के गांवों के किसान चेन्नई और मध्य प्रदेश या छतीसगढ़ के किसान बेंगलुरु जा कर अपनी फसल बेच सकेंगे. जिस किसान को अपने गांव से कृषि उपज मंडी तक फसल को ले जाने के लिए ट्रैक्टरट्रौली का जुगाड़ करना पड़ता हो, उसे दूसरे राज्यों में फसल बेचने का सपना दिखाया जा रहा है. मध्य प्रदेश के रामपुरा गांव के किसान पृथ्वीराज सिंह कहते हैं, "खाद, बीज और यूरिया की लाइन में लगने वाले गरीब लाचार किसान को बेंगलुरु और चेन्नई की मंडियों में फसल बेचने का झांसा देना किसान के साथ बेहूदा मजाक के सिवा कुछ नहीं है.

इस कानून का असली मतलब यह है कि बड़े आढ़तिए और कौर्पोरेट कंपनियां अब सीधे गांव में और देशभर में कहीं भी जा कर खरीदारी कर सकेंगी. जाहिर है, वे यह काम उन्हीं दलालों, व्यापारियों और आढ़तियों के जरिए ज्यादा करेंगी जिन के कब्जे में किसान मंडी और बाजार हैं. सीधे कहा जाए तो अब मंडियों के छोटेबड़े पंडे मठों के शंकराचार्यों के लिए कमीशन पर या सैलरी पर काम करते नजर आएंगे. बड़ी कंपनियां अपने धनबल के दम पर उपज खरीदी पर अपना एकाधिकार बना लेंगी. उस के बाद किसानों के लुटे जाने का आलम क्या होगा, यह पिछली पीढ़ी जानती है कि किस तरह सूदखोर व्यापारी किसानों को अपने फंदे में फंसाता था और औने पौने दाम पर सारी उपज खरीद लेता था. प्राकृतिक आपदा की मार पड़ने पर यही व्यापारी ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज दे कर धीरेधीरे किसान की जमीन भी हड़प जाता था.

इस अध्यादेश की धारा 4 में कहा गया है कि किसान को पैसा 3 कार्यदिवसों में दिया जाएगा. किसान का पैसा फंसने पर उसे दूसरे मंडल या प्रांत में बारबार चक्कर काटने होंगे. न तो 2-3 एकड़ जमीन वाले किसान के पास फसलों के पैसे पाने की ताकत है और न ही वह इंटरनैट पर अपना सौदा कर सकता है. यही कारण है कि इस का विरोध हो रहा है और हैरत की बात यह है कि उपज की कीमत वक्त पर न मिलने की स्थिति, जो किसानों की नियति बन जाएगी, में वे अदालत का दरवाजा भी नहीं खटखटा सकते.

ठेका खेती को जीवनदान के साथ खुला मैदान

दूसरा कानून मूल्य आश्वस्ति तथा कृषि सेवाओं संबंधी किसानों का (सशक्तीकरण तथा संरक्षण) समझौता अध्यादेश 2020 पूरे देश में ठेका खेती लाने की वकालत करता है. इस का कितना विनाशकारी और दूरगामी असर होगा, इसे अंगरेजी राज के तजरों और 18वीं सदी में जबरिया कराई गई नील की उस खेती के अनुभव से समझा जा सकता है जिस के नतीजे में लाखों एकड़ जमीन के बंजर होने और 2 अकालों के रूप में इस देश ने देखे और भुगते हैं.

इस में राज्य सरकारों के पास ठेका खेती की अनुमति देने या न देने का विकल्प भी नहीं है. उन का काम आंख बंद कर के केंद्र सरकार के हुक्म को लागू करना है. कंपनियों और ठेका खेती कराने वाले धनपतियों की सुरक्षा और संरक्षण के ऐसेऐसे प्रावधान इस अध्यादेश में किए गए हैं जो शायद ही किसी और मामले में हों. अध्यादेश के मुताबिक, कंपनी की किसी भी गड़बड़ी या उस के और किसान के बीच उत्पन्न विवाद पर अदालतें सुनवाई तक नहीं कर सकेंगी. जो भी करेगा वह कलैक्टर और एसडीएम जैसा नौकरशाह करेगा और वह भी वही करेगा जैसा करने के निर्देश उसे सीधे केंद्र सरकार द्वारा दिए जाएंगे.

रायसेन जिले के छबारा गांव के किसान धर्मेंद्र धाकड़ बताते हैं कि पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम, कलैक्टर जैसे राजस्व महकमे के लोग किसानों के जमीनजायदाद के बंटवारे जैसे कामों को बिना घूस लिए नहीं करते, उन से किसानों के हितों की अपेक्षा नहीं की जा सकती.

जमाखोरी, मुनाफाखोरी, कालाबाजारी की खुली इजाजत

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