21वीं सदी में भी मर्द मालिक औरत गुलाम
Sarita|October First 2020
21वीं सदी में भी मर्द मालिक औरत गुलाम
पितृसत्ता सिर्फ जोरजबरन वाली व्यवस्था नहीं रही है जिसे मात्र पुरुषों के बीच जनजागृति कर सुलझा लिया जाए, बल्कि इस का ठोस आधार सदियों से मजबूत रहा है जिस में महिलाओं के पैरों में भी सहमति की जंजीरें बंधती रही हैं.
भारत भूषण श्रीवास्तव और रोहित

बीती 19 सितंबर को वरिष्ठ अधिवक्ता और भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की है कि महिलाओं के लिए न्याय, समानता और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए उत्तराधिकार और विरासत कानूनों का लैंगिक व धार्मिक बंधनों से मुक्त होना बेहद जरूरी है. यह कम हैरानी की बात नहीं कि भाजपा और आरएसएस से जुड़ा कोई नेता खासतौर से यह कहे कि महिलाओं से जुड़े कानूनों को धार्मिक बंधनों से मुक्त किया जाए. मौजूदा सरकार के क्रियाकलापों को देखते हुए तो यह परिकल्पना भर लगती है.

अश्विनी कुमार ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने अभी तक इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया है. फिर तो, निश्चित रूप से उन्हें यह भी मालूम होगा कि आजादी के बाद जब हिंदू कोड बिल संसद में पेश किया गया था तब हिंदूवादियों ने आसमान सिर पर उठा लिया था क्योंकि उस बिल में महिलाओं और शूद्रों को सवर्णों के बराबर अधिकार दिए जा रहे थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस विधेयक का मसौदा तैयार करने वाले संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर से सहमत थे, लेकिन भारी विरोध के चलते उन्होंने चतुराई से काम लिया और पेश किए गए प्रावधानों को टुकड़ेटुकड़े कर महिलाओं व शूद्रों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए यथासंभव कोशिशें कीं, इसीलिए आज भी वे कट्टर हिंदूवादियों के निशाने पर रहते हैं.

यह हिंदू कोड बिल की देन ही है कि महिलाओं को पहली बार तलाक लेने, वोट देने और जायदाद में हिस्सेदारी सहित दूसरे ऐसे कई अधिकार मिले जो धर्म की निगाह में गुनाह हैं क्योंकि तमाम धर्मग्रंथों के मुताबिक औरत तो मर्द की गुलाम है. हालात अभी भी बहुत ज्यादा बदले नहीं हैं. ऐसे में अश्विनी कुमार की नीयत पर सवाल खड़ा करने के बजाय उन की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए जो अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा करने की हिम्मत तो जुटा पा रहे हैं वरना तो वक्तवक्त पर मचते बवाल महिलाओं की बेचैनी को ही उजागर करते हैं.

क्या मिलता है विवादों से

आज से लगभग 3 वर्षों पहले 2017 में देश में सबरीमाला मंदिर को ले कर मुद्दा गरमाया था. सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी. इस से पहले 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी. कारण उन के मासिकधर्म से जुड़ा हुआ था, जिसे हिंदू धर्म में अशुद्ध माना जाता है.

देश के प्रगतिशील हलकों में इसे ले कर खुशी थी कि महिलाओं ने मंदिर जाने के अधिकार को हासिल कर लिया, लेकिन यह जाने क्यों किसी ने नहीं सोचा कि जिन धर्मग्रंथों ने कभी महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं दिया और मंदिर में घुसने के लिए बाड़े लगाए, वहां घुसने की जिद क्यों? अब होगा यह कि महिलाएं उस मंदिर में जा कर पंडितों का खजाना भरने में ही योगदान देंगी और, जिन भगवान के नाम पर उन्हें सालों से मंदिरों में घुसने से रोका गया, अब उन की ही आरती उतारेंगी.

पितृसत्ता की जड़ें

पितृसत्ता या पुरुषसत्ता को ले कर आमतौर पर माना जाता है कि यह एक प्रकार की सोच है जो पुरुषों द्वारा महिलाओं को अपने नियंत्रण में रखने के लिए थोपी गई. किंतु अगर इस विषय को समझा जाए तो यह सोच कब की उखड़ चुकी होती अगर यह व्यवस्था का रूप धारण न करती और पितृसत्ता की विचारधारा में इस व्यवस्था का मुख्य पहलू अगर महिलाओं का बड़े स्तर पर सहमत होना न होता.

महिलाओं की सहमति को पुरुषों द्वारा इतिहास में कई तरीकों से हासिल किया गया. फिर चाहे वह प्रोडक्शन संस्थाओं को उन की पहुंच से दूर रखना हो या परिवार के मुखिया पर उन्हें पूर्ण निर्भरता के लिए मजबूर करना हो. किंतु सोचने वाली बात यह है, क्या महज जोरजबरदस्ती कर के सैकड़ों सालों तक महिलाओं से पुरुषों के नियंत्रण में रहने की उन की सहमति उगलवाई जा सकती थी? क्या उन्हें डराधमका कर सदियों तक आसानी से चुपचाप घरों के भीतर नजरबंद किया जा सकता था? नहीं.

इस मसले पर सब से पहले यह समझना जरूरी है कि पितृसत्ता सिर्फ एक जोरजबरन वाली व्यवस्था नहीं रही है जिसे मात्र पुरुषों के बीच जनजागृति कर सुलझा लिया जाए, बल्कि इस का ठोस आधार कई सदियों से मजबूत रहा है जिस में महिलाओं के पैरों में भी सहमति की जंजीरें बंधती रही हैं.

इस आधार को मजबूती कई इकाइयों में परिवार नामक संस्था हमेशा से देती आई है और इन पारिवारिक संस्थाओं के निर्देशन का केंद्र सदियों से चलती आ रही धार्मिक मान्यताएं रहीं. इन धार्मिक मान्यताओं का आधार हमेशा से वे धार्मिक ग्रंथ रहे जिन्होंने पितृसत्ता को मजबूती प्रदान की. इस प्रकार धर्म और परिवार मिल कर ऐसी संस्कृति का निर्माण करते रहे जो किसी भी हाल में महिलाओं को आजाद किए जाने के खिलाफ थी.

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