करवाचौथ एकाकी महिला के लिए गाली
Sarita|October First 2020
करवाचौथ एकाकी महिला के लिए गाली
समाज में अकेली, निर्बल नारी को और ज्यादा अकेला व भयभीत करने के लिए करवाचौथ का सामूहिक प्रदर्शन धर्म के ठेकेदारों द्वारा आयोजित करवाया जाता है. करवाचौथ जैसा व्रत महिलाओं की एक मजबूरी के साथ उन को अंधविश्वास के घेरे में रखे हुए है जो पुरुषसत्ता को और भी मजबूत करता है. ऐसे में महिलाओं का करवाचौथ मनाना कितना उचित है, जानें.
नसीम अंसारी कोचर

कामिनी सिंगल मदर है. 6 साल का सुमित उस के जीवन की इकलौती खुशी है. करीब 5 साल पहले एक रोड ऐक्सिडेंट में कामिनी के पति चल बसे. तब सुमित सिर्फ एक साल का हुआ था. यह तो अच्छा था कि दिल्ली जैसे शहर में उस के पति का खुद का फ्लैट था, वरना दुधमुंहे बच्चे के साथ विधवा औरत का किसी किराए के मकान में जिंदगी बसर करना तमाम खतरों से भरा हुआ है.

कामिनी को अपना यह फ्लैट बहुत प्यारा है. उस के पति की निशानी है. बिल्डिंग के चौथे और अंतिम फ्लोर पर रहने वाली कामिनी को बिल्डिंग की छत को इस्तेमाल करने का अधिकार मिला हुआ है. कामिनी के बहुत सारे काम छत पर होते हैं. छत के एक हिस्से को उस ने किचनगार्डन का रूप दिया हुआ है, जिस में खूब हरियाली रहती है. उस के करीब ही उस ने एक छोटी टेबल, 2 चेयर्स, रंगीन कुंडे और एक टेबलफैन लगा कर नन्हा सा औफिस बना लिया है, जहां हरियाली के बीच बैठ कर वह अपने लैपटौप पर औफिस का काम भी कर लेती है. शनिवार और इतवार की उस की शामें सुमित के साथ इसी छत पर बीतती हैं. नन्हा सुमित छत पर स्केटिंग करता है और मां के साथ गार्डनिंग में हाथ बंटाता है. वह औफिस का काम करती है तो सुमित जमीन पर रंगों के साथ खेलते हुए पेंटिंग में मशगूल रहता है.

कामिनी अच्छी कंपनी में कार्यरत है, अच्छा कमा लेती है, अपने बेटे को अच्छी परवरिश दे रही है और उस के साथ बहुत खुश है. नौकरीपेशा कामिनी ने बड़ी हिम्मत के साथ खुद को और अपने बेटे को संभाला हुआ है. वह अकेली है, इस बात का एहसास उस को साल में सिर्फ एक बार होता है करवाचौथ के दिन जब शाम होते ही उस की छत पर बिल्डिंग के सभी फ्लोर पर रहने वाली औरतें नखशिख तक श्रृंगार कर के, करवे की थालियां सजा कर, दीये और मिठाइयां ले कर ढोलमजीरे के साथ आ धमकती हैं और उस के सुकून में आग लगा देती हैं.

मात्र दिखावा

दरअसल, करवाचौथ का चांद देख कर व्रत तोड़ने के लिए सभी महिलाएं छत पर शाम से ही इकट्ठा होने लगती हैं. 3 बजे से ही कुछ महिलाएं छत के बीचोंबीच रंगोली बनाने लगती हैं. इस के लिए कभीकभी तो कामिनी के छोटे से गार्डन में बड़ी मेहनत से उगाए गए फूलों की बलि भी चढ़ जाती है. फिर तमाम महिलाएं रंगोली के गिर्द गोले में अपनीअपनी करवे की थालियां सजा देती हैं. जिन के पीछे बैठ कर ढोलमजीरे के साथ सुहागिनों के गीत गाए जाते हैं. करवे की कहानी सुनी जाती है.

वैसे, औरतों का ध्यान करवा की कहानी से ज्यादा अन्य महिलाओं के वस्त्रों और आभूषणों पर होता है. व्रत के बावजूद 4 बजे के बाद कोल्डड्रिंक पीने की इजाजत पंडित ने दे रखी है, लिहाजा, 4 बजते ही धड़ाधड़ कोल्डड्रिंक की बोतलें खुलने लगती हैं. हंसीमजाक, गानेनाचने और अपनी नईनई महंगी ड्रैसेस, आभूषणों और शृंगारों के दिखावे के इस पब्लिक कार्यक्रम के साथ खाली बोतलें और उन के ढक्कन पूरी छत पर इधरउधर फैल जाते हैं. दीयों के तेल, मिठाइयों के डब्बे और रैपर, माचिस की तीलियों व अन्य कचरे से कामिनी की साफसुथरी छत पर गंदगी का ढेर लग जाता है, जिस को साफ करने की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता.

चांद के निकलते ही तमाम औरतें व्रत तोड़ कर पकवानों से पेट भरने के लिए अपने अपने किचन की और दौड़ पड़ती हैं. गंदगी से पटी छत पीछे छूट जाती है, जिसे कामिनी दूसरे, तीसरे और चौथे दिन तक साफ करती रहती है.

करवाचौथ का दिन कामिनी के लिए साल का सब से मनहूस दिन होता है. यह दिन उस को गाली की तरह लगता है. उपेक्षा की सलाखों से उस का सीना छलनी होता है. घृणा की नजरें उस को बेधती हैं. सुहागिनों के गीत उस के कानों में गरम पिघले सीसे की तरह महसूस होते हैं. कभीकभी तो वह गहरी उदासी और अवसाद में चली जाती है.

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