युवा बेहाल मांगे रोजगार
Sarita|October First 2020
युवा बेहाल मांगे रोजगार
पिछले 4 महीनों में 50 लाख वेतनभोगी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा चुका है. बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ कर 1.89 करोड़ पहुंच गया है. सीएमआईई द्वारा जारी बेरोजगारी का ताजा आंकड़ा भारत की इकोनौमी की रिकवरी पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है.
रोहित

देश के युवाओं ने 17 सितंबर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन को अवसर बनाते हुए उक्त दिन को इस वर्ष 'राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस' के तौर पर मनाया. भाजपा नेतृत्व वाली केंद्रीय सरकार के कार्यकाल में पिछले 6 वर्षों में ऐसा समय पहली बार आया जब देश के तितरबितर पड़े युवा मिल कर एकसुर में मोदी के राज के खिलाफ मुखर हुए.

बेरोजगारी के मसले पर भले न्यूज चैनल युवाओं को भटकाने की मुहिम में लगे हुए हों या इस को दबाने में लिप्त हों लेकिन कुछ समय से देखने में आ रहा है कि युवाओं का एक हिस्सा लगातार मोदी के खिलाफ उग्र होता जा रहा है. उन की उग्रता का बड़ा कारण रोजगार की लगातार बढ़ती समस्या है. देश में यह दिक्कत मोदी हुकूमत की गलत नीतियों के चलते पहले से ही शुरू हो गई थी, लेकिन इसे एक बड़ा झटका तब लगा जब मोदी ने तानाशाही रवैया अपनाते बिना सोचेविचारे, देश में और देशवासियों पर लौकडाउन थोप दिया.

2013 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी आगरा में एक रैली को संबोधित कर रहे थे. उन दिनों नरेंद्र मोदी न सिर्फ देश की समस्या जानते थे बल्कि हर समस्या का तुरंत इलाज भी उन की जेब में हुआ करता था. तब मोदी ने कहा था, "अगर भाजपा सरकार में आती है, तो देश के युवाओं के लिए हर साल 1 करोड़ नौकरियां मिलेंगी," वहीं उपस्थित राजनाथ सिंह ने कहा था, "मोदीजी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आतंकवाद पूरी तरह से खत्म हो जाएगा और कोई भी देश भारत की तरफ गलत इरादों से आंख दिखाने की हिम्मत नहीं कर पाएगा.

जाहिर है, मोदी बखूबी यह जानते थे कि इस देश में किस आयुवर्ग के लोगों का अधिक प्रभुत्व है और उन की कमजोर नस कहां है. इसलिए उसी रैली में उन का कहना था, "देश की आबादी का 65 फीसदी हिस्सा 35 वर्ष से कम उम्र के युवा तबके का है, जो आज बेरोजगारी से जूझ रहा है." उन्होंने उस दौरान युवाओं को रोजगार के सब्जबाग दिखाए थे.

खैर, यह बात 7 वर्षों पहले की है, लेकिन इन दोनों बयानों का आज की युवापीढ़ी के लिए खासा महत्त्व है. आज बेरोजगारी इस देश का सब से बड़ा रोड़ा बना हुआ है. चूंकि, अब राजनाथ सिंह रक्षा मंत्री हैं तो उन्हें पता ही होगा कि देश की मुंडेर पर बैठा चीन न सिर्फ भारत को आंख दिखा रहा है, बल्कि कब्जा भी कर रहा है. वहीं, पड़ोसी मुल्कों से तनाव बढ़ रहा है, यहां तक कि साझा संस्कृति वाला देश नेपाल भी हमारे खिलाफ उठ खड़ा हुआ है.

पिछले साल की एक सरकारी रिपोर्ट में रोजगार की स्थिति चिंताजनक से भी नीचे चली गई थी. रिपोर्ट में कहा गया था, 'देश पिछले 45 साल की बेरोजगारी से अधिक की बेरोजगारी झेल रहा है. 60 प्रतिशत से अधिक डिग्रीधारक युवा घर में बेरोजगार बैठे हुए हैं.' लेकिन, उस दौरान युवाओं की आंखों में अंधराष्ट्रवाद का धुंध खूब चढ़ाई गई.

भाजपा यह बखूबी जानती थी कि वह पिछले 5 वर्षों के दौरान किए गए बेवकूफीभरे कामों को ले कर युवाओं से वोट मांगने की स्थिति में नहीं है, यही कारण था कि यूथ वोट हासिल करने के लिए वह युवाओं को लगातार मुद्दों से भटका कर, राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रभक्ति का राग अलापने में लगी रही. इस में वह सफल भी हुई. और 2019 लोकसभा चुनाव को पहले से अधिक सीटों से जीती भी. फिर भी, आज सब से बड़ा सवाल यह कि भाजपा के दोबारा सरकार बनाने से युवाओं को क्या हासिल हुआ?

बेरोजगारी का बढ़ता आंकड़ा

सीएमआईई यानी सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकोनौमी की तरफ से बेरोजगारी को ले कर आए नए आंकड़े के तहत, मई से अगस्त के दौरान लगभग 50 लाख वेतनभोगी कर्मियों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है. इस के साथ ही, पेशेवर रोजगार की दर 2016 की तुलना में आज सब से निचले पायदान पर पहुंच चुकी है.

नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक थोपे गए लौकडाउन की वजह से नौकरीपेशा लोगों के बेरोजगार होने का आंकड़ा 1.89 करोड़ जा पहुंचा है. 1.77 करोड़ लोगों ने अप्रैल में अपनी नौकरियां गंवाई थीं. उस के बाद मई में एक लाख लोगों ने नौकरियां गंवाईं. जून से अनलौक प्रक्रिया शुरू हुई, जिस के पहले फेज में नौकरियां वापस आने लगी थीं. उस दौरान बताया गया कि लगभग 39 लाख नौकरियां वापस आई हैं. लेकिन जुलाई में बाजार के सुस्त और निष्क्रिय रहने के चलते और लोकल लैवल पर समयसमय पर लौकडाउन लगने से दोबारा नौकारियों में भारी छंटनी हुई.

रिपोर्ट में बताया गया है कि नौकरीपेशा लोगों, जो सैलरीबेस्ड काम करते थे, पर लौकडाउन का अधिक असर पड़ा है. गौरतलब है कि भारत में 21 फीसदी लोग नौकरी पेशागत काम से जुड़े हुए हैं, जिन पर लौकडाउन का भारी असर पड़ा है.

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