न्याय के तराजू में धर्म का बाट क्यों
Sarita|September Second 2020
न्याय के तराजू में धर्म का बाट क्यों
न्याय की मूर्ति की आंखों पर पट्टी बांध रखी है, सो, हाथ का देसी तराजू ही संतुलित होता है. पर अगर न्यायाधीश खुली आंखों से देख कर तराजू के पलड़ों में धर्म के बाट डाल कर फैसले करने लगे, तो समाज का सुधार कैसे होगा?
रोचिका अरुण शर्मा

विवाह के सात फेरों संग दूल्हादुलहन दोनों ही एकदूसरे से सात वचन निभाने का वादा करते हैं, किंतु कई बार आग की लपटों की तपिश खत्म होने के साथ ही ये वचन शीघ्र ही भुला दिए जाते हैं और ससुराल में विवाहिता को पति व ससुराल के दूसरे सदस्यों द्वारा खूब प्रताड़ित किया जाता है.

कभी रीतिरिवाजों के नाम पर तो कभी उस के परिधान पर टोकाटोकी. कहीं दहेज की समस्या तो कहीं बहू द्वारा कमाई तनख्वाह पर नजर. इस तरह के बहुत से मामले आमतौर पर देखे जाते रहे हैं जिन में कई बार महिला ताउम्र प्रताड़ित होती रही है. परंतु अब कई महिलाएं आवाज भी उठाती हैं और वे न्यायालय के दरवाजे भी खटखटाने लगी हैं.

ऐसे ही एक केस के फैसले में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी शाखा यानी कौड़ियों से बनी चूड़ियां पहनने से मना करे तो मतलब उसे शादी से इनकार है. कोर्ट ने इस आधार पर तलाक के लिए याचिका डालने वाले एक पुरुष को अपनी पत्नी को तलाक देने के लिए इजाजत दे दी जबकि फैमिली कोर्ट ने इस का उलटा फैसला किया था और तब यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा था.

खबर एनडीटीवी डौट कौम के अनुसार, पति की ओर से यह याचिका फाइल की गई थी जिस की सुनवाई करते हुए जस्टिस अजय लांबा और जस्टिस सौमित्र सैकिया ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को उलट दिया जिस में कहा गया था कि पत्नी की ओर से पति पर कोई क्रूरता नहीं की गई है और इस के चलते तलाक का कोई आधार नहीं बनता.

19 जून को दिए इस फैसले में कहा गया कि पत्नी का शाखा और सिंदूर न पहनना उसे या तो कुंआरी दिखाता है या फिर इस का मतलब है कि उसे यह शादी मंजूर नहीं है. पत्नी का ऐसा रुख साफ दिखाता है कि वह अपना विवाह जारी नहीं रखना चाहती.

हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला ने अपने पति के खिलाफ शिकायत भी दर्ज करवाई थी और उस पर व ससुराल वालों पर प्रताड़ना का आरोप भी लगाया था लेकिन खंडपीठ ने कहा कि प्रताड़ना के आरोप प्रमाणित नहीं हो पाए हैं.

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